बुंदेलखंड की औरतें

पिछले हफ्ते मुझे भोपाल से आगरा होते भरतपुर लौटना था antarvasna antarvassna Indian Sex Kamukta Chudai Hindi Sex मेरी सीट का नंबर ए-14 था। खिड़की के साथ वाली सीट का नंबर 13 था। यह 13 का आंकड़ा मुझे बड़ा चुभता है। आप तो जानते ही हैं 13 तारीख को मेरी मिक्की हमें छोड़ कर इस दुनिया से चली गई थी। मैं अभी उस नंबर को देख ही रहा था कि इतने में एक 18-19 साल की लड़की भागती हुई सी आई और उस 13 नंबर वाली सीट पर आकर बैठ गई। उसके बदन से आती पसीने और जवानी की मादक महक से मैं तो अन्दर तक सराबोर हो गया। उसे झांसी तक जाना था। उसने कानों में सोने की छोटी छोटी बालियाँ और सर पर काली टोपी पहन रखी थी। मुँह में चुइंगम चबाती हुई तो यह मेरी सिमरन या मिक्की जैसी ही लग रही थी। (आपको “काली टोपी लाल रुमाल” वाली सिमरन और “तीन चुम्बन” वाली मिक्की याद है ना) कद लगभग 5’ 2″ होगा। रंग थोड़ा सांवला था पर गोल मटोल चेहरा अगर थोड़ा गोरा होता या आँखें बिल्लोरी होती तो यह सिमरन ही लगती। जीन-पेंट और टी-शर्ट पहने छोटे छोटे बालों की पीछे लटकती चोटी तो बरबस मुझे उस पर मर मिटने को ही कह रही थी।

उसने शायद जल्दबाजी में गाड़ी पकड़ी थी गर्मी भी थी और दौड़कर आने से उसे पसीने भी आ रहे थे इसलिए उसने अपनी टी शर्ट के बटन खोल दिए और उसे आगे से पकड़ कर रुमाल से हवा सी करने लगी। अन्दर गुलाबी रंग की ब्रा में कसे उसके मोटे मोटे गोल उरोज देख कर तो मुझे लगने लगा मैं बेहोश ही हो जाऊँगा। उसकी तेज साँसों के साथ उसके उठते गिरते मोटे मोटे उरोज तो ऐसे लग रहे थे जैसे बारजे (छज्जे) से सुबह की मीठी गुनगुनी धुप उतर रही हो। सबसे कमाल की बात तो उसके भरे हुए गुदाज़ नितम्ब थे। इस उम्र में इतने कसे और मांसल नितम्ब और वक्ष तो बुंदेलखंड की औरतों के या फिर खजुराहो की मूर्तियों के होते हैं।

झाँसी तक का सफ़र बड़े इत्मीनान से कट गया। रास्ते में उसने मुझसे कोई ज्यादा बातचीत नहीं की वो तो बस अपने लैपटॉप में ही उलझी रही। उसकी पतली पतली लम्बी अंगुलियाँ देख कर तो मेरा मन बरबस करने लगा कि अगर यह अपने हाथों में मेरा लंड पकड़ कर ऐसी ही अपनी अँगुलियों से सहलाए तो मैं निहाल ही हो जाऊं। वह झाँसी स्टेशन पर उतर गई। जाते समय उसके मोटे मोटे नितम्बों को लचकता देख कर मैं तो बस ठंडी आहें भरता ही रह गया।

मैं अपने प्यारे लाल को शांत करने के लिए बाथरूम जाने ही वाला था कि एक 25-26 साल का शख्स उस सीट पर आकर बैठा गया। उसने नमस्ते किया। फिर बातों बातों में उसने बताया कि वह भी झांसी का रहने वाला है और आगरा किसी साक्षात्कार (इंटरव्यू) के लिए जा रहा है। थोड़ी देर में वो खुल गया और उसने बताया कि वो सेक्सी कहानियों का बड़ा शौक़ीन है। उसने भी अपनी 18 साल की साली की चुदाई की है और वो इस किस्से को कहानी के रूप में लिख कर प्रकाशित करवाना चाहता है पर उसे नहीं पता कि कैसे लिखे और कैसे उसे प्रकाशित करवाया जाए।

मैं झांसी और बुन्देलखंड के बारे में थोड़ा जानने को उत्सुक था। कारण आप जानते ही हैं। उस लौंडिया को देखकर मेरी उत्सुकता बढ़ गई थी। उसने बताया कि वैसे तो बुन्देलखंड और झाँसी महारानी लक्ष्मी बाई के लिए प्रसिद्ध है लेकिन बुन्देलखंड यहाँ की एतिहासिक धरोहरों का केंद्र भी है। यहाँ आपको लड़कियों की ज्यादा लम्बाई तो नहीं मिलेगी पर उनके नितम्ब और वक्ष तो आँखों को ठंडक और ताजगी देने वाले होते हैं। रंग तो इतना गोरा नहीं होता, थोड़ा सांवला होता है पर नैन नक्श बहुत कटीले होते हैं। इसलिए तो इन्हें काला जादू कहा जाता है। आपने खजुराहो की मूतियाँ के रूप में इनका नमूना तो जरुर देखा होगा। कहते हैं एशिया में सबसे खूबसूरत औरतें या तो अफगान में होती हैं या फिर बंगाल और बुंदेलखंड की। चुदाई की बड़ी शौक़ीन होती हैं और छोटी उम्र में ही चुदना चालू कर देती हैं।

पहले तो अक्सर लड़कियों की शादी 15-16 साल में हो जाती थी पर आजकल 18 में कर देते हैं। यहाँ के लड़के भी कद-काठी में तो छोटे होते हैं पर होते गठीले और चुस्त हैं। चुदाई ठीक से करते हैं। चूंकि लड़कियों की शादी जल्दी हो जाती है तो 5-7 साल की चुदाई में 3-4 बच्चे पैदा करके वो ढीली पड़ने लगती हैं तो मर्द दूसरी औरतों के पीछे और औरतें मर्दों के पीछे लगी ही रहती हैं। जीजा-साली और देवर-भाभी में अकसर शारीरिक सम्बन्ध बन जाते हैं इसे आमतौर पर इतना बुरा नहीं माना जाता।

हालांकि मैंने अपना असली परिचय नहीं दिया पर उसे यह आश्वासन जरुर दिया कि तुम मुझे अपना किस्सा बता दो मैं उसे कहानी के रूप में लिख कर प्रकाशित करवा दूंगा। उसने जो बताया आप भी सुन लें :

मेरा नाम दीपक राय कुशवाहा है। अपने माँ बाप और इकलौती पत्नी ज्योति के साथ झाँसी में रहता हूँ। झांसी के एक साधारण परिवार का रहने वाला हूँ इसलिए जो भी ही बोलूँगा सच बोलूँगा और लंड चूत और चुदाई के सिवा कुछ नहीं बोलूँगा। उम्र 25 साल है। मेरा क़द 5’ 6″ है, गठीला बदन और लंड 6″ के आस पास है। मैं दूसरे लोगों की तरह 8-10 इंच के लंड की डींग नहीं मारूंगा। मेरी शादी दो साल पहले ज्योति के साथ हुई है। सालियों के मामले में मैं बड़ा भाग्यशाली हूँ। 3 तो असली हैं बाकी 6-7 आस पड़ोस की भी हैं। मेरी पत्नी से छोटी शुकू शू (18) है उस से छोटी पुष्पा (16) और फिर रचना (14) वाह…। क्या सही अनुपात और उचित दूरी पर इतनी खूबसूरत फूलों की क्यारियाँ लगाई हैं। लोग परमात्मा का धन्यवाद करते हैं मैं अपनी सास और ससुर का करता हूँ जिन्होंने इतनी मेहनत करके इतने खूबसूरत फूल बूटे लगाए हैं जिनकी खुशबू से सारा घर और आस पड़ोस महकता है।

खैर अब मुद्दे की बात पर आता हूँ। मैं अपनी 3 सालियों की चर्चा कर रहा था। शुकू शू मेरी पत्नी से 2 साल छोटी है। उसके चूतड़ बहुत मस्त और कटाव भरे हैं। उसकी मांसल जांघें और गोल गोल मुलायम भरे हुए चूतड़ देख कर तो मेरे लिए अपने आप पर संयम रखना बड़ा कठिन हो जाता था। चोली और लहंगे में लिपटा उसका गुदाज़ बदन देख कर तो मेरे तन बदन में आग सी लग जाती थी और मेरा मन करता कि उसे अभी दबोच लूं और उसकी कहर ढाती जवानी के रस की एक एक बूँद पी जाऊं। बोबे तो बस दूध के भरे थन हैं जैसे।

किसी ने सच कहा है बीवी और मोबाइल में एक समानता है कि “थोड़े दिन बाद लगता है कि अगर थोड़ा रुक जाते तो अच्छा मॉडल मिल जाता” खैर मैं इस मामले में थोड़ा भाग्यशाली रहा हूँ। पर शुकू शू की कसी हुई जवानी ने मेरा जीना हराम कर दिया था। मैं किसी तरह उसे चोदना चाहता था। पर मेरी पत्नी इस मामले में बड़ी शक्की है।

आप शुकू शू नाम सुन कर चोंक गए होंगे। उसका नाम तो शकुंतला शाहू है पर मैं उसे प्यार से शुकू शू बुलाता हूँ। मेरी शादी के समय तो वो बिलकुल सूखी मरियल सी लगती थी इसीलिए मैंने उसका नाम शुकू शू रख दिया था। पर इन दो सालों में तो जैसे झांसी की सारी जवानी ही इस पर चढ़ आई है। उसके अंग-अंग में से जवानी छलक रही है। सच ही है जब डाली फ़लों से लद जाती है तो स्वयमेव ही झुकने लग जाती है। मेरा मन करता था कि इन फ़लों का रस चूस लूं। उसके चूतड़ों की गोलाईयां और दरार इतनी मस्त और लचकदार हैं मानो मेरे लण्ड को अन्दर समाने के लिये आमन्त्रित ही करती रहती थी। जब वो अपने कसे हुए वक्ष को तान कर चलती है तो ऐसे लगता है बेतुआ नदी अपने पूरे उफान पर है।

ओह… चलो मैं पूरी बात बताता हूँ :

मेरी पत्नी के पहला बच्चा होने वाला था। वो मुझे अपनी चूत नहीं मारने देती थी। मैं हाथों में लंड लिए मुठ मारने को विवश था। पर मुझे तो जैसे भगवान ने छप्पर फाड़ कर सालियाँ दे दी हैं। बेचारी शुकू शु कहाँ बचती। जी हाँ ! मैं शकुंतला की ही बात कर रहा हूँ। जिसे मैं प्यार से शुकू शु कहा करता हूँ। वो भी मुझे कई बार मज़ाक में दीपक कुशवाहा की जगह कुशू कुशू या दीपक राय की जगह डिब्बे राम या दीपक राग कह कर बुलाती है पर सबके सामने नहीं। अकेले में तो वो इतनी चुलबुली हो जाती है कि जी करता है उसे पकड़ कर उल्टा करूं और अपना लंड एक ही झटके में उसकी मटकती गांड में ठोक दूं।

वो अपनी दीदी की देखभाल के लिए हमारे यहाँ आई हुई थी। वैसे तो दो कमरों का मकान है पर हम तीनों ही एक कमरे में सोते थे। शकुंतला साथ में छोटी चारपाई डाल लेती थी। दिन में तो वह लहंगा चुनरी या कभी कभी साड़ी पहनती थी पर रात को सोते समय झीना सा गाउन पहनकर सोती थी। सोते समय कभी कभी उसका गाउन ऊपर हो जाता तो उसकी मखमली जांघें दिखाई दे जाती थी और फिर मेरा लंड तो आहें भरने लग जाता था। उसने अपनी थोड़ी पर छोटा सा गोदना गुदवा लिया था उसे देख कर पुरानी फिल्म मधुमती वाली वैजयन्ती माला की बरबस याद आ जाती है। उसके सुगठित, उन्नत, गोल-गोल लुभावने उरोजों के बीच की घाटी, मटकते गुदाज़ नितम्ब, रसीले और तराशे हुये होंठ, उसकी कमनीय आँखों में दहकता लावा देख कर कई बार तो मुझे इतनी उतेजना होती कि मुझे बाथरूम में जाकर उसके नाम की मुठ लगानी पड़ती। जी में तो आता कि सोई हुई इस सलोनी कबूतरी को रगड़ दूं पर ऐसा कहाँ संभव था। साथ में ज्योति और माँ बापू भी रहते थे।

सुबह जब ज्योति उठ कर हवा पानी (टॉयलेट) करने चली जाती तो शुकू शू हमारे बिस्तर पर आ जाती और मेरी और अपने चूतड़ करके सो जाया करती। उसके मोटे मोटे नितम्ब देख कर मेरा लौड़ा खड़ा हो जाता और मैं नींद का बहाना करके अपना लंड गाउन के ऊपर से ही उसके चूतड़ों की दरार से लगा देता। वो थोड़ा कसमसाती और फिर मेरी ओर सरक आती। कई बार वो पेट के बल लेट जाती थी तो उसके उभरे हुए गोल गोल चूतड़ों को देखकर मेरा लंड तो आसमान ही छूने लगता था। जी में आता था अभी इसकी मटकती गांड मार लूं। मैं ज्योति की भी गांड मारना चाहता था पर वो पट्ठी तो मुझे उस छेद में अपना लंड क्या अंगुली भी नहीं डालने देती। पता नहीं ये बुंदेलखंड की औरतें भी गांड मरवाने में इतनी कंजूसी क्यों करती हैं।

कई बार तो शुकू अपनी एक टांग मेरी कमर के ऊपर या टांगों के बीच भी डाल दिया करती थी। पहले तो मैंने ध्यान नहीं दिया पर अब मुझे लगने लगा था कि वो ऐसा जानबूझ कर करती है। आज सुबह जब वो सोई थी तो मैंने धीरे से अपना खड़ा लंड उसकी गांड पर लगा दिया तो वो थोड़ा सा मेरी ओर सरक आई। मैंने पहले तो उसकी कमर पर हाथ रखा और फिर धीरे से अपना हाथ उसके मोटे मोटे स्तनों पर रख दिया। वो कुछ नहीं बोली। अब मैंने धीरे से उसके गाउन के ऊपर से ही उसके स्तन दबाना और सहलाना शुरू कर दिया। इतने में ही ज्योति अन्दर आ गई तो शुकू आगे सरक गई और गहरी नींद में सोने का बेहतरीन नाटक करने लगी जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो।

अब तो जैसे मेरे हाथों में कारूँ का खज़ाना ही लग गया था। बस मौके की तलाश और इंतज़ार था। और फिर जैसे भगवान् ने मेरी सुन ली। माँ और बापू दोनों गाँव चले गए क्योंकि वहां दादाजी की टांग टूट गई थी। मैंने आज ऑफिस से छुट्टी कर ली थी। ज्योति के लिए कुछ दवाइयां लेनी थी सो मैं जब बाज़ार जाने लगा तो शुकू को साथ ले लिया।

मैंने रास्ते में उसे पूछा “शुकू अब तो घर वाले तुम्हारी भी शादी करने वाले होंगे ?”

“अरे ना बाबा ना… मुझे अभी शादी नहीं करनी ?”

“क्यों ?”

“शादी के नाम से ही मुझे डर लगता है ?”

“कैसा डर ?”

“डरना तो पड़ता ही है। पता नहीं पहली रात…?” कहते कहते वो शरमा गई।

अनजाने में वो बोल तो गई पर बाद में उसे ध्यान आया कि वो क्या बोल गई है। वो तो किसी नाज़ुक कलि की तरह शर्म से लाल ही हो गई और उसने दुपट्टे को मुँह पर लगा लिया।

“हाय … मेरी शुकू शु… प्लीज बताओ ना पहली रात में किस चीज का डर लगता है ?”

“नहीं मुझे शर्म आती है ?”

“चलो पहले से सब सीख लो फिर ना तो शर्म आएगी और ना ही डर लगेगा ?”

“क्या मतलब ?”

“अरे बाबा मैं सिखा दूंगा तुम चिंता क्यों करती हो ? और फिर सिखाने की फीस भी नहीं लूँगा ? यह तो मुफ्त का सौदा है !”

“दीदी आपकी जान ले लेगी ?”

“अरे मेरी भोली शुकू शू तुम्हारी दीदी मेरी जान तो पहले ही ले चुकी है बस तुम अगर हाँ कर दो फिर देखो तुम्हारा डर कैसे दूर भगाता हूँ ?”

“धत… मुझे ऐसी बातों से शर्म आती है… अब घर चलो !”

“आईईलाआआ …”

दोस्तों ! अब तो बस रास्ता साफ़ ही था। हमने रास्ते में प्रोग्राम बनाया कि रात में ज्योति को दूध के साथ नींद की गोली दे देंगे और हम दोनों साथ वाले कमरे में सारी रात धमा चौकड़ी मचाएंगे। किसी को कानों-कान खबर नहीं होगी।

रात को लगभग 10:30 बजे शुकू डार्लिंग ज्योति के लिए दूध लेकर आ गई। जब ज्योति के खर्राटे बजने लगे तो हमने आँखों ही आँखों में इशारा किया और चुपके से दबे पाँव साथ वाले कमरे में आ गए। मैंने कस कर उसे बाहों में भर लिया और जोर जोर से चूमने लगा। मैंने उसके नर्म नाज़ुक होंठों को अपने मुँह में भर लिया और चूसने लगा। उसने भी मुझे कस कर अपनी बाहों में भर लिया। उसकी साँसें तेज़ होने लगी। अब मैंने अपनी जीभ उसके मुँह में डाल दी। वो उसे चूसने लगी। कभी मैं उसके होंठों को चूसता चूमता और कभी उसके गालों को। वो पूरा साथ देने लगी। फिर मैंने उसके स्तन भी दबाने चालू कर दिए। शुकू अब सीत्कार करने लगी और घूम कर अपने चूतड़ मेरी ओर कर दिए। मैंने कस कर उसे भींच लिया और अपने लंड को उसकी गांड से सटा दिया। मैंने पायजामा पहन रखा था सो उस दोनों गुम्बदों के बीच आराम से सेट हो गया। अपना लंड सेट करने के बाद एक हाथ नीचे उसकी चूत की ओर बढ़ाया। जैसे ही मैंने उसकी चूत पर हाथ लगाया तो उसने अपनी जांघें भींच ली और जोर की किलकारी मारी।

मैंने पतले और झीने गाउन के ऊपर से ही अपनी ऊँगली से उसकी चूत की फांकों को टटोला और थोड़ी सी अंगुली अन्दर कर दी। उसके गीलेपन का अहसास होते ही मेरे लंड ने एक जोर का ठुमका लगाया। शुकू तो सीत्कार पर सीत्कार करने लगी। पता नहीं उसे क्या सूझा वो झट से मेरी पकड़ से छुट कर नीचे बैठ गई और एक झटके में मेरे पायजामे को नीचे सरका दिया। मेरा फनफनाता हुआ लंड अब ठीक उसके मुँह के सामने आ गया। उसने झट से उसे मुँह में भर लिया और चूसने लगी। मेरे लिए तो यह स्वर्ग जैसे आनंद के समान था।

ज्योति ने कभी मेरा लंड इतने अच्छी तरह से नहीं चूसा था। वो तो बस ऊपर ऊपर से ही कभी कभी चुम्मा ले लिया करती है या फिर उसके टोपे को जीभ से सहला देती है। आह… इस अनोखे आनन्द का तो कहना ही क्या था। शुकू जब अपनी जीभ को गोल गोल घुमाती और चुस्की लगाती तो मैं उसका सर अपने हाथों में पकड़ कर एक हल्का सा धक्का लगा देता तो मेरा लंड उसके कंठ तक चला जाता। वो तो किसी कुल्फी की तरह उसे चूसे ही जा रही थी। कभी पूरा मुँह में ले लेती और कभी उसे बाहर निकाल कर चाटती। कभी मेरे अण्डों को पकड़ कर मसलती और उनकी गोलियां भी मुँह में भर कर चूस लेती। पता नहीं कहाँ से ट्रेनिंग ली थी उसने।

मैं कामुक सीत्कारें किये जा रहा था। मुझे लगने लगा मैं उसके मुँह में ही झड़ जाऊँगा। वह तो उसे छोड़ने का नाम ही नहीं ले रही थी। अब मैंने भी सोच लिया कि अपने अमृत को पहली बार उसके मुँह में ही निकालूँगा। मैंने उसका सर जोर से पकड़ लिया। और धीरे धीरे लयबद्ध तरीके से धक्के लगाने लगा जैसे वो उसका मुँह न होकर चूत ही हो।

“याआ… हाय… ईईईई … मेरी शुकू शू और जोर से चूसो मेरी ज़ान मज़ा आ रहा है… हाई…।”

मेरी मीठी सीत्कारें सुनकर उसका जोश दुगना हो गया और वो पूरा लंड मुँह में लेकर जोर जोर से चूसने लगी। अब मैं कितनी देर ठहरता। मेरी पिचकारी फूट पड़ी और सारा वीर्य उसके मुँह में ही निकल गया। वो तो उसे गटागट पीती ही चली गई। अंतिम बूँद को चूस और चाट कर वो अपने होंठों पर जीभ फिराती हुई उठ खड़ी हुई। मैंने उसे एक बार फिर अपनी बाहों में भर कर चूम लिए।

“वाह… मेरी शुकू शू आज तो तुमने मुझे उपकृत ही कर दिया मेरी जान !” मैंने उसके होंठों को चूमते हुए कहा।

“मुझे भी बड़ा मज़ा आया … बहुत स्वादिष्ट था। मैंने कई बार अम्मा को बापू का चूसते देखा है। वो भी बड़े मज़े से सारा रस पी जाती है।”

“अरे मेरी रानी मेरी शुकू शू तुम ज्योति को भी तो यह सब सिखाओ ना ?” मैंने कहा।

“अरे बाप रे ! अगर दीदी जग गई तो… हाय राम…” वो बाहर भागने लगी तो मैंने उसे फिर से दबोच लिया। वो कसमसा कर रह गई।

“ओहो मेरी डिब्बे राम जी थोड़ा सब्र करो। पहले दीदी को तो देख आने दो वो कहीं जग तो नहीं गई ?”

“जरा जल्दी करो !”

“अच्छा जी !”

शुकू दबे पाँव अन्दर वाले कमरे में ज्योति को देखने चली गई और मैं बाथरूम में चला गया।

मैंने अपना कुरता और पजामा निकाल फेंका और अपने लंड को ठीक से धोया। कोई 10 मिनट बाद जब मैं नंग धडंग होकर बाहर वाले कमरे में आया तो शुकू मेरा इंतजार ही कर रही थी। मैंने दौड़ कर उसे बाहों में भरना चाहा। इस आपाधापी में वो लुढ़क कर बेड पर गिर पड़ी और मैं उसके ऊपर आ गया। मैंने उसके गालों और होंठों को चूमना चालू कर दिया। मैंने उसका गाउन उतार दिया। उसने ब्रा और पेंटी नहीं पहनी थी। उसके गोल गोल संतरे ठीक मेरी आँखों के सामने थे। मैं तो उन पर टूट ही पड़ा। मैंने एक बोबे के चूचक को अपने मुँह में भर लिया और चूसने लगा। दूसरे हाथ से उसके दूसरे बोबे को मसलना और दबाना चालू कर दिया।

शुकू ने मेरा लंड पकड़ लिया और उसे सहलाने लगी। 2-3 मिनट मसलने और सहलाने से वो दुबारा खड़ा होकर उसे सलामी देने लगा। अब मैंने उसके पेट को चूमा और फिर नीचे सहस्त्र धारा की ओर प्रस्थान किया। छोटे छोटे काले घुंघराले झांटों से लकदक चूत तो कमाल की थी। मोटे मोटे सांवले होंठ और अन्दर थोड़ी बादामी रंग की कलिकाएँ। मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि उसकी चूत के अन्दर वाले होंठ थोड़े सांवले क्यों हैं। कुंवारी लड़कियों की चूत के अन्दर के होंठ तो गुलाबी होते है। शुकू ने मुझे बाद में बताया था कि वो रोज़ अपनी चूत में अंगुली करती है और अपनी फांकों और कलिकाओं को भी मसलती और रगड़ती है इसलिए वो थोड़े सांवले हो गए हैं।

चलो कोई बात नहीं मुझे रंग से क्या लेना था। स्वाद और मज़ा दोनों तो आ ही जायेगे। मैंने अपनी लपलपाती जीभ उसकी चूत के होंठो पर लगा दी। शुकू ने मेरा सर अपने हाथों में पकड़ लिया और अपनी चूत की ओर दबा सा दिया। मैंने अपनी जीभ से उसकी कलिकाओं को टटोला तो उसकी हर्ष मिश्रित चीत्कार सी निकल गई।

अब मैंने अपने हाथों से उसकी फांकों को चौड़ा किया। अन्दर से गुलाबी रंगत लिए चूत पूरी गीली थी। मैंने झट से उस पर अपनी जीभ फिराई और फिर दाने को टटोला। वो तो उत्तेजना के मारे अपने पैर ही पटकने लगी। मैंने तो उसकी रसभरी फांकों को मुँह में भर लिया और जोर जोर से चूसने लगा। उसका दाना तो लाल अनारदाने जैसा हो गया था अब। मैंने जीभ की नोक बना कर उसे चुभलाया तो वो कामुक सीत्कार करती हुई बोली “आह … कुशू अब और ना तड़फाओ अब अन्दर डाल दो … उईईई… जिज्जूऊऊऊ…… ?”

“हाई मेरी शुकू शू डालता हूँ।”

“उईई… मोरी … अम्माआआ… ईईईईईईइ”

“शुकू तुम्हारी चूत का रस तो बहुत मजेदार है !”

“ऊईईई… माआआ………”

उसका शरीर जोर से अकड़ा और चूत से काम रस फिर से टपकने लगा। शायद वो झड़ गई थी। उसकी साँसें तेज़ हो गई थी और आँखें बंद। अब मैंने अपने लंड को उसकी चूत की फांकों पर लगा दिया। उसने अपनी जांघें चौड़ी कर ली। मैंने उसके सर के नीचे एक हाथ लगाया और और एक हाथ से अपने लंड को पकड़ कर उसकी चूत के छेद पर सेट करके एक धक्का लगा दिया। मेरा लंड गच्च से 3 इंच तक अन्दर समां गया। उसके मुँह से मीठी सीत्कार निकल गई।

“उईईई… माआआ………”

वह कसमसाने लगी। मुझे लगा इस तरह तो मेरा बाहर निकल जाएगा। मैंने उसे बाहों में भर कर कस लिया और एक धक्का फिर लगा दिया। लंड महाराज पूरे के पूरे अन्दर प्रविष्ट हो गए। मैंने एक काम और किया उसके मुँह पर हाथ रख दिया नहीं तो उसकी चीख ज्योति को सुनाई देती या नहीं देती पड़ोसियों को जरुर सुन जाती। उसकी घुटी घुटी सी चीख निकल ही गई।

“गूं………उंउंउंउंउंउंउं……………………”

वो कसमसाती रही पर मैं नहीं रुका। मैंने उसे बाहों में जकड़े रखा। वो हाथ पैर पटकने लगी और मेरी पकड़ से छूटने का कोशिश करती रही। मैंने उसे समझाया “बस मेरी शुकू अब अन्दर चला गया है। अब चिंता मत करो… अब तुम्हें भी मज़ा आएगा।”

“उईइ मा… मैं तो दर्द के मारे मर जाउंगी ओह… जिज्जू बाहर निकाल लो… मुझे दर्द हो रहा है…।”

“बस मेरी जान ये दर्द तो दो पलों का है फिर देखना तुम खुद कहोगी और जोर से करो !”

उसने आँखें खोल कर मेरी ओर देखा। मैं मुस्कुरा रहा था। शायद उसका दर्द अब कम हो गया था। उसकी चूत ने अब पानी छोड़ दिया था और गीली होने के कारण लंड को अन्दर बाहर होने में कोई समस्या नहीं थी। उसकी चूत ने जब संकोचन करना चालू कर दिया तो मेरे लंड ने भी अन्दर ठुमके लगाने चालू कर दिए। अब तो उसकी चूत से मीठा फिच्च फिच्च का मधुर संगीत बजने लगा था और वो अपने चूतड़ उछाल उछाल कर मेरा साथ देने लगी।

“क्यों मेरी शुकू अब मज़ा आ रहा है या नहीं ?”

“ओह… मेरे कुशू कुशू जिज्जू मैं तो इस समय स्वर्ग में हूँ बस ऐसे ही चोदते रहो… आःह्ह… और जोर से करो… रुको मत… उईईइ…”

“शुकू मैंने कहा था ना बहुत मज़ा आएगा ?”

“ओह… हाँ… अबे डिब्बे राम ! जरा जल्दी जल्दी धक्के लगाओ ना ? अईई…?”

उसकी चूत ने मेरे लंड को जैसे अन्दर भींच ही लिया। उसकी मखमली गीली दीवारों में फसा लंड तो ठुमके लगा लगा कर ऐसे नाच रहा था जैसे सावन में कोई मोर नाच रहा हो। हमें कोई 10-15 मिनट तो हो ही गए थे। मैं उसे अब घोड़ी बना कर एक बार चोदना चाहता था। पिछले 3-4 महीने से ज्योति ने मुझे बहुत तरसाया था। बस किसी तरह पानी निकालने वाली बात होती थी। वह तो बस टाँगें चौड़ी करके पसर जाती थी और मैं 5-10 मिनट धक्के लगा कर पानी निकाल देता था। और अब पिछले 2-3 महीनों से तो उसने चूत चोदने की तो छोड़ो चूत पर हाथ भी नहीं धरने दिया था।

मैंने उसे चौपाया हो जाने को कहा तो झट से डॉगी स्टाइल में हो गई और अपने चूतड़ ऊपर उठा दिए। गोल गोल दो छोटे छोटे तरबूजों जैसे चूतड़ों के बीच की खाई तो कमाल की थी। गांड के छेद का रंग गहरे बादामी सा था। चूत के फांकें सूज कर मोटी मोटी हो गई थी और उस से रस चू रहा था। मैंने उसके चूतड़ों को चौड़ा किया और अपना लंड फिर से उसकी चूत में डाल दिया। लंड गीला होने के कारण एक ही झटके में अन्दर समां गया। मैंने उसकी कमर पकड़ कर अब धक्के लगाने शुरू कर दिए। उसने अपना सर नीचा करके सिरहाने से लगा लिया और सीत्कार पर सीत्कार करने लगी। अब मेरा ध्यान उसकी गांड के छेद पर गया। वो भी थोड़ा गीला सा हो चला था। कभी खुलता कभी बंद होता। वाह… क्या मस्त गांड है साली की। एक बार तो मन में आया कि अपना लंड गांड में डाल दूं पर बाद में मैं रुक गया।

मैं जानता हूँ कोई भी लड़की हो या फिर औरत पहली बार गांड मरवाने में बड़े नखरे करती हैं और कभी भी आसानी से गांड मरवाने के लिए इतनी जल्दी तैयार नहीं होती। और फिर बुंदेलखंड की औरतें तो गांड मरवाने के लिए बड़ी मुश्किल से राज़ी होती हैं। खैर….. मैंने अपनी अंगुली पर थूक लगाया और शुकू की गांड के छेद पर लगा दिया। वह तो उछल ही पड़ी।

“ओह… क्या करते हो जिज्जू ?’

“क्यों क्या हुआ?”

“नहीं… नहीं… इसे अभी मत छेड़ो… ?”

मुझे कुछ आस बंधी कि शायद बाद में मान जायेगी। अब मैंने फिर से उसकी कमर पकड़ ली और दनादन धक्के लगाने चालू कर दिए। हम दोनों को ही इतनी कसरत के बाद पसीने आने लगे थे। कोई 20-25 मिनट तो हो ही गए थे। मैंने उसे जब बताया कि मैं झड़ने वाला हूँ तो वो बोली कोई बात नहीं अन्दर ही निकाल दो मैं “मेरी सहेली” (गर्भ निरोधक गोली) खा लूंगी।

मैं तो धन्य ही हो गया। मैंने उसे कस कर पकड़ लिया और फिर जैसे ही 3-4 आखरी धक्के लगाये मेरा लावा फूट पड़ा। शुकू शू भी उस वीर्य के गर्म फव्वारे से नहा ही उठी। उसकी चूत आज धन्य और तृप्त हो गई। मेरा लौड़ा तो धन्य होना ही था। जब मेरी अंतिम बूँद निकल गई तो मैं उस से अलग हो गया। फिर हम दोनों बाथरूम में चले गए और साफ़ सफाई करने के बाद बाहर आये तो वो बोली “चलो अब गर्म गर्म दूध पी लो एक राउंड और खेलेंगे ?” इतना कहकर उसने मेरी ओर आँख मार दी।

मैंने उसे एक बार फिर अपनी बाहों में जकड़ लिया और जोर से भींच दिया। उसकी तो चीख ही निकल गई। फिर उस रात मैंने उसे दो बार और चोदा। सुबह 4 बजे हम अन्दर वाले कमरे में जाकर अपनी अपनी जगह सो गए। बस दोस्त ! इतनी ही कहानी है उस रात की।