मंगलसूत्र (एक लघु-कथा) 1

बात थोड़ी पुरानी antarvasna है, लेकिन उससे कोई ख़ास फ़र्क नहीं पड़ता है। मैं और मेरा परिवार मूलतः भारत देश के केरल राज्य से हैं। यह बात अलग है कि मेरा जन्म और मेरी परवरिश, पढ़ाई लिखाई सारी उत्तर-भारत में हुई है। फिर भी वंशावली के नाते ही सही, केरल राज्य से मेरे प्रगाढ़ सम्बन्ध सदैव ही रहे है। केरल को भारत में ‘देवों के देश’ (God’s own country) के नाम से भी जाना जाता है।

उस बात के कई सारे कारण हो सकते हैं – सबसे पहली बात यह कि केरल प्राकृतिक रूप से एक अत्यंत सुन्दर भूमि है… अप्रतिम! नैसर्गिक सौन्दर्य को भ्रष्ट करने के हमारे लाख प्रयत्नों के बाद भी यहाँ की प्राकृतिक सुंदरता अभी भी लगभग वैसी ही है जैसी की लगभग एक सहस्त्र वर्ष पहले रही होगी। सहत्रों वर्षों से विभिन्न मानव जातियाँ केरल आती रहीं, और मिलती रहीं। द्रविड़, सीरिआई, आर्य, अरबी और ऐसी ही कई प्रकार की मानव जातियाँ यहाँ आयीं और मिलती रहीं। और इन्ही मिश्रित परम्पराओ से उपजी है केरल की अत्यंत संपन्न संस्कृति!

खैर, भावनाओं की रौ में बहने से पहले मैं अब कुछ अपने और अपने परिवार के बारे में बता देता हूँ। मैं अर्चित हूँ… और अपने माता पिता का एकलौता संतान हूँ। मेरे पिता मेरी माँ से करीब दस साल बड़े हैं – यह कोई प्रेम विवाह नहीं था, बल्कि मेरे माता-पिता के माता-पिता द्वारा तय किया हुआ विवाह था। उन दोनों के विवाह का एक ही कारण था, और वो था मेरे पिता की सरकारी नौकरी! वो अलग बात है की बाद में मालूम पड़ा की वो एक अच्छे इंसान भी हैं। माँ अपने विवाह के समय अल्पवयस्क थीं, मुश्किल से कोई सोलह साल की। तब तो शादियाँ ऐसे ही हो जाती थीं। माँ के मुकाबले पिता जी कोई ख़ास नहीं दिखते थे। लेकिन एक, उनके पास सरकारी नौकरी थी, और दो, वो एक बहुत ही अच्छे इंसान थे। विवाह के बाद उन्होंने माँ को काफी प्रोत्साहन दिया। हाँलाकि मैं माँ के सत्रह होने से पहले ही पैदा हो गया था, लेकिन पिता जी ने माँ को आगे पढ़ने के लिए लगातार प्रोत्साहित किया, और उनको जैसे तैसे ग्रेजुएट बनाया। मुझे जन्म देने के कोई पांच साल बाद माँ ने स्वयं भी नौकरी करना आरम्भ कर दिया। उन दोनों की ही नौकरियाँ उत्तर-भारत में थीं। और उनका ज्यादातर समय अपने अपने कार्य में ही बीतता था।

मैं बचपन से ही काफी जीवंत था। और मेरी ऊर्जा का मुकाबला न तो मेरे पिता ही कर पाते थे, और न ही मेरी माता। मेरे जन्म के समय माँ के शरीर में कुछ जटिलता उत्पन्न हो गई थी, इसलिए उनको और संताने नहीं हो सकीं – अन्यथा उन दिनों एक संतान का चलन नहीं था। खैर, काम के बोझ से मेरे माता पिता दोनों ही थके हुए और चिड़चिड़े से रहते थे। इसलिए मेरे साथ बहुत समय नहीं बिता पाते थे। जैसे जैसे मेरी उम्र बढ़ी, वैसे वैसे हमारे बीच दूरियाँ बढ़ती गयीं। ऐसा नहीं है की मैं उनका आदर नहीं करता था और वो मुझसे प्रेम नहीं करते थे – बस यह की हम एक दूसरे को अपनी भावनाएं खुल कर नहीं कह पाते थे। इन सब बातों का असर यह हुआ की मैं अपने शुरूआती जीवन के बाद, जल्दी ही आत्म-निर्भर हो गया। आज़ाद खयाली के कारण मेरी सोच भी भेड़-चाल से भिन्न विकसित होती गई।

जब कभी भी उनको छुट्टियां मिलती थी, तो हम अपने तय स्थान केरल जा कर मनाते थे। केरल में मेरे नाना-नानी और मौसी रहते थे। नाना-नानी की कई संतानें हुईं, लेकिन फिलहाल केवल माँ और मौसी ही जीवित बच सके। लिहाज़ा, माँ और मौसी के बीच उम्र का लम्बा चौड़ा अंतर था। मेरी मौसी अल्का मेरी माँ से कोई आठ नौ साल छोटी रही होंगी। उनका नाम उनके घने घुंघराले बालों के कारण ही पड़ा था। सच तो यह है कि मैं केरल जाने की राह अक्सर ही देखता रहता था – और उसका कारण थीं मेरी मौसी अल्का।

उनके लिए मेरे मन में गंभीर प्रेमासक्ति थी। मेरे कहने का यह मतलब कतई नहीं है की मेरे मन में उनको लेकर किसी प्रकार की कामुक फंतासी थी। मैं बस यह कहना चाहता हूँ कि मेरे मन में इनके लिए एक प्रबल और स्मरणीय स्नेह था। और उनके मन में मेरे लिए!

माँ कभी कभी मुझे कहती भी थी, “अल्का तुमको बहुत प्यार करती है। उसके लिए तुम दुनिया के सबसे प्यारे बच्चे हो! और हो भी क्यों न? तुम भी तो उसके सामने एक सीधे सादे बच्चे बन जाते थे!”

यह बात सच भी थी – उनके साथ एक सप्ताह बिताना भी मुझे अच्छा लगता था। उनके आस पास रहने से मेरी अतिसक्रियता अचानक ही कम हो जाती थी। अल्का मौसी बदले में मेरे साथ विनोदप्रियता, बुद्धिमत्ता और प्रेम से व्यवहार करती थीं। न तो वो कभी मुझसे ऊंची आवाज़ में बात करती थीं, और न ही कभी मेरी मार पिटाई करती थीं। इस कारण से दुनिया में वो मेरी सबसे पसंदीदा व्यक्ति थीं।