मंगलसूत्र (एक लघु-कथा) 14

मुझे तो बस यही antarvasna उम्मीद थी, कि उसको मेरी बात और उसके लिए मेरे मन में प्यार का अनुमान और भरोसा हो सके! उसने मेरे चेहरे को अपनी हथेली में ले कर बहुत देर तक मुझे यूँ ही देखा, और फिर कहना जारी रखा,

“कुट्टन मेरे, मैं तुमको यह अधिकार देती हूँ कि तुम मेरे कपड़े उतार सको! … तुम मुझे नंगा देख सकते हो!”

“क्या?” गले से आवाज़ निकलनी बंद हो गई।

उसने मुस्कुराते हुए बस ‘हाँ’ में सर हिलाया। मैं काफी देर तक जड़वत खड़ा रहा, कुछ कहते या करते नहीं बना!

“जानू, जल्दी ही शाम हो जायेगी! नहाना नहीं है?” अल्का फुसफुसाई। मुझे वो और कितना उकसा सकती है!

बात तो सही थी! लेकिन फिर भी मेरे शरीर में उतनी तेजी नहीं आई – संभवतः, मैं अल्का को निर्वस्त्र करने की जल्दी में नहीं था। लेकिन बस यह ख़याल कि मेरी हर हरकत से उसका मूर्त रूप सामने आता जाएगा, बहुत ही रोमांचक और विलक्षण था। और मैं इस दृश्य के हर एक रसीले पल को अच्छे से अपनी आँखों में सोख लेना चाहता था।

मैंने हाथ बढ़ाया, और उसकी शर्ट का एक बटन खोल दिया, और उसकी आँखों में झाँका। मुझे प्रेरित करने के लिए वो मुस्कुराई। हम दोनों के ही माथे और होंठ के ऊपर पसीने छलक आये थे। गर्मी थी, या फिर घबराहट? शर्ट के छः बटन कम से कम पांच मिनट तो लग ही गए होंगे। न जाने मुझे ऐसा क्यों लग रहा था कि यदि जल्दी जल्दी किया तो अल्का को चोट न लग जाय! शर्ट के पट अलग तो हो गए, लेकिन अल्का की हरी झंडी के बाद भी मैं पट को अलग नहीं कर पा रहा था। मेरी हौसला अफ़ज़ाई के लिए अल्का ने स्वयं ही शर्ट अपने शरीर से उतार कर अलग कर दी। वो सफ़ेद रंग की साधारण सी ब्रा पहने हुए थी। आगे मैंने जो किया वो उसके लिए भी अप्रत्याशित था – संभवतः वो सोच रही होगी कि अगला नंबर उसकी ब्रा का था, लेकिन मैंने उसकी जीन्स को निशाना बनाया। उसकी जीन्स उतारते समय मैं अधिक बेधड़क था।

अल्का कुछ देर ऐसे खड़ी रही – मेरे अगले कदम की प्रतीक्षा में, लेकिन जब मैंने कोई हरकत नहीं दिखाई, तो वो स्वयं ही मेरे सामने मुड़ गई, और इस समय उसकी पीठ मेरे सामने हो गई। मेरे लिए संकेत स्पष्ट था – उसके स्तनों को मुक्त करने का समय आ गया था। काँपते हाथों से उसकी ब्रा का हुक खोला और बाकी का काम उसने ही कर दिया। मुझे मालूम था कि मेरे सामने पीठ किये खड़ी इस लड़की के स्तन अब अनावृत हो चले हैं। लेकिन, काम अभी भी बचा हुआ था। मैं घुटने के बल ज़मीन पर बैठ गया और धीरे धीरे उसकी चड्ढी उतारने लगा। सात आठ मिनट तक चले इस वस्त्र-हरण कार्यक्रम को करते हुए मुझे ऐसा लगा कि जैसे घंटो बीत गए!

अपने स्तनों को हाथों से ढके हुए अल्का मेरी तरफ मुड़ी – योनि छुपाने का उसने कोई प्रयास नहीं किया। सच कहूँ, तो मुझे किसी उम्मीद नहीं थी कि हमारे बीच जो बात मज़ाक मज़ाक में शुरू हुई थी, वो इतनी गंभीर हो जायेगी। हम दोनों की सांसे अब धौंकनी के जैसे चलने लगीं थीं, मेरा शिश्न उत्तेजना की पराकाष्ठा पर पहुँच कर ऊर्ध्व हो गया था, और पैंट के अंदर से बाहर होने को आतुर हो रहा था।

मैंने अल्का के दोनों हाथों को प्रेम से पकड़ कर हटाया – जो दिखा उसकी तो मैं बस कल्पना ही कर सकता था! आशा के अनुरूप, अल्का की छाती पर शानदार और ठोस स्तनों की अभिमानी जोड़ी उठी हुई थी। मेरी तर्जनी के नोक के आकार के समान ही गहरे भूरे रंग के चूचक, और उनके चारों तरफ तीन इंच का भूरे रंग का वृत्ताकार घेरा! वो घेरा सपाट नहीं था, बल्कि स्तनों पर से उठा हुआ था। कभी ताजमहल का गुम्बद देखा है? ठीक उसी के जैसे अल्का के स्तनों के तीन भाग थे – सबसे नीचे एक चिकना शुद्ध अर्द्ध-गोला, उसके ऊपर भूरे रंग की एक एक वृत्ताकार टोपी, और उसके भी ऊपर मेरी तर्जनी की नोक के आकार के चूचक! मेरी दृष्टि नीचे की तरफ गई – उसकी दोनों जांघों के बीच बहुत सहेज कर रखा हुआ घने बालों का एक नीड़ (घोंसला) था, और उसी नीड़ में छुपा हुआ था, अल्का का प्रेम-कूप!

“अल्का…” मेरे मुंह से बढ़ाई के शब्द अपने आप ही फूट पड़े, “तुम बहुत सुन्दर हो! आई ऍम सो लकी!”

निर्वस्त्र होते समय तो नहीं, लेकिन अपनी बढ़ाई सुनते ही अल्का के पूरे शरीर में लज्जा की लालिमा दौड़ गई।

“और… मेरा जानू कैसा है?”

हाँ! मुझे भी तो निर्वस्त्र होना था। मैं जल्दी जल्दी अपने कपडे उतारने लगा। मैं इस काम में इतना मगन हो गया, कि यह मालूम ही नहीं पड़ा कि अल्का मुझे छोड़ कर तालाब के पानी में डुबकी लगा चुकी। वो तो जब पानी की छपछपाहट, और उसके हंसने की आवाज़ आई, तब समझ आया। अब तक मैं भी नंगा हो गया था, और उसकी तरफ मुड़ कर तालाब की तरफ जाने लगा। मेरा शिश्न तो हमेशा की तरह तन कर तैयार हो गया था। इस पूरे घटनाक्रम, और वातावरण के कारण दो प्रकार का प्रभाव हो रहा था – एक तो मेरे शरीर में सिहरन सी दौड़ रही थी, और दूसरा मेरे वृषण की थैली सिकुड़ कर जघन क्षेत्र के बेहद करीब जा कर चिपक गई थी। अच्छी बात यह है की स्तम्भन अपनी पराकाष्ठा पर था – मैं अल्का को दिखाना चाहता था की अब मैं पहले जैसा बच्चा नहीं रहा।

मेरे चलने पर मेरा शिश्न इधर उधर डोल रहा था, और इस हलचल के कारण लिंगमुण्ड उसी तनी हुई अवस्था में हवा में ही छोटे छोटे वृत्त से बना रहा था। अल्का का हंसना बंद हो गया, और अब वो रूचि ले कर मेरे शिश्न को, और मुझे अपनी तरफ आते हुए देख रही थी। जब मैं पानी के अंदर आकर उसके बगल जा बैठा, तो वो फिर से मुस्कुराई और बोली,

“चिन्नू…. तुम्हारा कुन्ना (लिंग) तो कितना बड़ा हो गया है, और प्यारा भी!”

“तुमको कैसे मालूम?” मैंने अल्का को छेड़ा।

“तुम भूल गए? जब तुम छोटे थे तो मैंने कितनी बार तुम्हे नहलाया है।”

“मुझे सब याद है मौसी” मैंने उसको छेड़ना जारी रखा, “मुझे यह भी याद है की तुम इसे अपने मुँह में ले कर दुलारती थी। तुम्हे याद है या भूल गई?”

बचपन में हम दोनों का एक बेहद निजी खेल था – जब कभी भी आपसे में खेली जाने वाली किसी भी खेल-प्रतियोगिता में मैं उनसे जीतता था, तो मुझे पुरस्कार स्वरुप यह मिलता था। अल्का मेरे छोटे से शिश्न को अपने मुँह में ले कर दुलारती थी। मुझे बाद में कई बार यह लगता कि वो मुझे जान बूझ कर जीतने देती थी, लेकिन इस बात के लिए कैसी शिकायत भला!

“हाँ लेकिन तब तुम छोटे थे। अब तुम बड़े हो गए हो… और तुम्हारा ‘ये’ भी बड़ा हो गया है।” अल्का मेरे इस उद्घोषणा, और अपनी कही हुई बात पर पुनः शर्मा गई।

“तुमको पसंद आया?”

“बहोत पसंद आया। अब तुम वाकई पूरे मर्द बन गए हो..”