मंगलसूत्र (एक लघु-कथा) 9

करीब आधे घंटे antarvasna के बाद हम दोनों वापस तालाब की तरफ चल दिए। रास्ते में मैंने हम क्या क्या उगायेंगे – इसके बारे में देर तक बातें करीं। सलाद पत्ती, जिसको लेटुस कहते हैं, एक दो महीने तक चलने वाली फसल है, चेरी टमाटर, लाल-पीले शिमला मिर्चें, और अंग्रेजी पालक.. अगर हो सके तो अंग्रेजी खीरे। इसके अलावा बारह मास उगने वाली बेसिल, बेबी स्पिनिच इत्यादि भी उगाया जा सकता है। अल्का मेरी बातें सुन रही थी और अपनी राय भी दे रही थी। पिछली बार की तरह आज अल्का के पीछे पीछे नहीं चल सकता था, इसलिए साथ में चल रहा था। हम आज जल्दी ही तालाब पर पहुँच गए।

“चलो, नहा लो!”

“तुम भी नहा लो..”

“लेकिन मैंने तो नहा लिया है।“

“फिर से नहा लो.. मेरे साथ?”

अल्का कुछ देर सोच में पड़ गई। मुझे मालूम था कि वो मेरे साथ आई ही इसलिए है कि साथ में तालाब में तैर सके, और नहा सके। लेकिन न जाने क्या सोच कर हिचक रही थी। खैर कोई दो मिनट के बाद वो बोली,

“ठीक है.. लेकिन एक बात याद रखना, मैं तुम्हारी मौसी हूँ….”

ये उसने क्यों कहा!

“तुम मेरी मौसी नहीं, मेरी प्यारी मौसी हो।” मैंने प्यार और मनुहार से कहा।

“तो ठीक है! लेकिन किसी से यह कहना मत! तुम्हारी माँ, और मेरी माँ मिल कर मेरी खाल खींच लेंगी, अगर उनको यह मालूम पड़ा।”

“मैं पागल हूँ क्या जो उनको कुछ कहूँगा!”

मुझे लगता है की अल्का के मन में कहीं किसी कोने में इस तरह के जोखिम भरे काम करने की इच्छा दबी हुई थी, जो मेरे उकसाने से बाहर उभर आई थी। अब जब उसने तालाब में नहाने का मन बना ही लिया था तो वो यह काम जल्दी से कर लेना चाहती थी। ठीक जैसे छोटे बच्चे करते हैं। उसने चारों तरफ सतर्कता से देखा, और जब संतुष्ट हो गई तो उसने अपने कुर्ते के बटन खोलने शुरू कर दिए। बटन खोलने के बाद उसको उतारने के लिए कुर्ते के नीचे का घेरा दोनों हाथों में पकड़ा और अचानक ही रुक गई। मैं अल्का को यह सब करते हुए अपलक देख रहा था।

“तुम उधर मुँह करो… तभी तो उतारूंगी!”

“तुम भी न! साथ में नहाना है, फिर भी…..” मैंने कहा और उसको देखता रहा।

अल्का ने कुछ देर तक मेरा दूसरी तरफ देखने का इंतज़ार किया, लेकिन फिर उसको लगा कि मैं उसको देखना बंद नहीं करूंगा। तो उसने अपना कुरता पकड़ कर सर से होते हुए उतार दिया।

अल्का का शरीर सचमुच गांधार प्रतिमाओं जैसा था – तराशा हुआ शरीर, सुडौल ग्रीवा, आवश्यकता से छोटी ब्रा में कसी हुई शानदार स्तनों की जोड़ी जो सामने की तरफ अभिमान से उठे हुए थे, क्षीण बल-खाती कमर, गहरी नाभि और उसके नीचे सौम्य उभार लिए हुए परिपक्व नितम्ब! अल्का मेरी निगहबानी में निर्वस्त्र होने की प्रक्रिया कर रही थी। शलवार भी जल्दी ही उसके शरीर से अलग हो गई। अल्का जैसी परिपक्व, सुन्दर और सुडौल लड़की को जब मैंने अपने सामने ब्रा और चड्ढी में खड़े देखा तो मैं भूल गया कि मुझे भी अपने कपडे उतारने थे।

अल्का ने जब मुझको अपलक ताकते हुए देखा तो कहा,

“चिन्नू…. अब बस करो! मुझे पहले ही इतनी शर्म आ रही है। मुझे ऐसे घूरोगे तो मैं तो पानी पानी हो जाऊँगी….”

मैं किसी तन्द्रा से जागा। मैंने जल्दी जल्दी अपनी शर्ट और पैंट उतारी और शीघ्र ही सिर्फ अपनी चड्ढी में रह गया। उस समय मैंने देखा कि एक भारी समस्या थी – मेरा लिंग इस समय पूरी तरह कड़ा हो गया था और उसमें रक्त के संचार की धमक के कारण बार बार स्पंदन हो रहा था। ऐसी निर्लज्जता से तड़पता हुआ व्याकुल लिंग अल्का से छुपा नहीं रह सकता था। उसने मेरे जघन क्षेत्र की तरफ देखा, और हलके से मुस्कुराई – बस एक बहुत ही मंद मुस्कान! चड्ढी से पूरी बेशर्मी से झांकता उभार देखकर उसको मेरे शारीरिक विकास का भान तो हो ही गया होगा! कुछ देर पहले तक अल्का को शर्म आ रही थी, लेकिन अब मेरी बारी थी। कपडे उतारते ही मैं तुरंत तालाब की तरफ भगा, और पानी में डूब गया। वहां जल्दी जाने के मुझे दो फायदे होने वाले थे – एक तो यह कि मेरा बेकाबू लिंग पानी में छुप जाएगा, और दूसरा यह कि पानी के अंदर रहते हुए मैंने इत्मीनान से अल्का को अंदर आते देख सकूँगा।

मैंने देखा कि अल्का वाकई बहुत ही सावधानीपूर्वक तालाब की तरफ आ रही थी। कभी कभी जब उसके पैरों तले कठोर और नोकीले पत्थर आ जाते, तो वो दर्द से चिहुँक जाती। अच्छा है की मैं पानी के अंदर था – अल्का को मात्र ब्रा और चड्ढी में अपनी तरफ आते देख कर मुझे ऐसा लग रहा था कि मेरे लिंग में जैसे विस्फोट हो जाएगा।

“जल्दी से आ जाओ – पानी बहुत अच्छा है!” मैंने कुछ कहने के इरादे से कह दिया। इसी बहाने मैं उसकी तरफ देख भी सकूँगा