मंगलसूत्र (एक लघु-कथा) 4

मौसी मेरे स्वागत antarvasna के लिए उस दिन, और अगले पूरे दिन घर पर ही रहीं। उनसे पूरे दो साल बाद मिला था – मौसी जब छोटी थीं, तो साफ रंग की थीं, लेकिन खेत खलिहान पर काम के कारण अब उनके रंग में सांवलापन बैठ सा गया था। वैसे रंग का सुन्दरता से क्या लेना देना? मेरे हिसाब से अब तो बहुत ही अधिक सुन्दर लगने लगी हैं। अगर कैराली मर्द रंग के पर्दे से परे देख सकते, तो समझते कि वो अपना क्या नुकसान कर रहे हैं!

नाना का घर बड़ा था, लेकिन आज कल घर का ज्यादातर हिस्सा एक तरह का गोदाम बन गया था। उपज अधिक होने के कारण घर के सारे कमरों को कोठरी के जैसे ही इस्तेमाल किया जा रहा था। इसलिए अब सिर्फ दो ही कमरे खुले हुए थे। एक कमरे में तो नानी रहती थीं, इसलिए मेरे पास बस दो ही विकल्प थे। पहला – या तो घर के बाहर सोना और रहना, या दूसरा – मौसी के साथ सोना या रहना! इतने वर्षों तक अकेले सोने के बाद मेरी किसी के संग सोने की आदत नहीं थी। खासतौर पर किसी लड़की के साथ! सतही तौर पर मैंने थोड़ी बहुत शिकायत तो करी, लेकिन फिर भी मौसी जैसी सुन्दर लड़की के साथ ‘सोने’ के अवसर पर मेरा मन प्रफुल्लित भी था। भई, अब मैं भी जवान हो गया था, और इस उम्र में लड़की का साथ बुरा तो नहीं लगता। वो अलग बात थी कि नानी की दृष्टि में मैं अभी भी छोटा बच्चा ही था।

माँ ने जाने से पूर्व मुझे कई सारे सामान दिए थे, मौसी, नानी और गाँव के अन्य ख़ास लोगों के लिए उपहार स्वरुप! लगभग सारे गाँव को मेरे आने का समाचार मिल गया था, इसलिए मुझसे मिलने काफी लोग और मेरे कुछ अभिन्न मित्र आये हुए थे। उन सभी से मैंने कुछ देर बात करी, और उनको उनके हिस्से के उपहार सौंप दिए। छोटे से समाज में रहने के बड़े लाभ है – जैसे की अभी की बात देख लीजिए। जो लोग मिलने आये, वो लोग कुछ न कुछ साथ में लाये भी (अधिकतर रात के खाने के लिए व्यंजन)। इसलिए घर में उस रात कुछ भी पकाना नहीं पड़ा।

खाने के बाद जब वो रात में कमरे में आईं, तो उन्होंने कहा की अब मैं उनको मौसी न कहा करूँ… सिर्फ ‘अल्का’ कहा करूँ! एक तो मौसी बहुत ही औपचारिक शब्द है, और अगर हम दोनों कहीं साथ में जा रहे हों, और मैंने उनको ‘मौसी’ कह कर बुलाया तो लोग समझेंगे कि मेरे साथ में कोई बुढ़िया जा रही है… और ऊपर से अगर हम दोनों साथ में सोने वाले हैं तो एक दुसरे का नाम ले कर बुलाने में कोई हर्ज़ नहीं है। यह बात कहते हुए वो हलके से मुस्कुरा भी रही थीं, और उनका चेहरा शर्म से कुछ कुछ लाल भी होता जा रहा था।

मैंने भी मौसी के लिए अपनी जेब-खर्च से बचा कर एक ‘छोटा सा’ उपहार खरीद लिया था। वह उपहार था, निक्कर और टी-शर्ट! माँ और पिता जी की नज़र से छुपा कर मैंने कैसे यह खरीदा और पैक किया था, मुझे ही मालूम है! लेकिन फिलहाल मुझे समझ नहीं आ रहा था कि उनका उपहार उनको कैसे दूँ! हम दोनों दोस्त भी थे, लेकिन हमारे सम्बन्ध की मर्यादा भी तो थी! लेकिन, जब मौसी ने मुझसे ऐसे बात करी, तो उनके इस खुलेपन के कारण मुझे भी कुछ कुछ हिम्मत आई। मैंने मौसी को उनका ‘उपहार’ दिखाया। वो उस छोटी सी निक्कर को देख कर पहले तो काफी हैरान हुईं, लेकिन फिर हलके से मुस्कुराईं भी!

“मैं इसको कब पहनूंगी? और तुमको कैसे लगा कि मैं ऐसे कपड़े पहन लूंगी?” उन्होंने मुझे छेड़ते हुए कहा।

“व्व्व्वो म्म्म्म्मौसी…”

“मौसी नहीं… अल्का कहो! याद है न?”

“ह्ह्ह्हान् अल्का… वो मैंने सोचा की यहाँ तो ऐसे कपड़े मिलते नहीं। इसलिए ले आया। सोचा की आपको अच्छा लगेगा।”

“यहाँ ये कपडे नहीं मिलते क्योंकि यहाँ कोई ऐसे कपडे नहीं पहनता। समझे मेरे चिन्नू!” मौसी मुझे प्यार से चिन्नू बुलाती थीं।

“त त तो? मतलब आप इसे नहीं पहनेंगी?”

“मैंने ऐसे कब कहा? मैंने तो बस इतना कहा कि मैं इसे कब पहनूंगी!” अल्का मौसी मुझे छेड़ रही थीं, यह बात मुझे समझ में आ गई। मैंने कुछ हिम्मत दिखाई।

“क्यों? अभी पहन लीजिए?”

“अभी? तुम्हारे सामने?” अल्का का नाटक जारी था।

“हाँ!”

“चिन्नू जी, क्या चल रहा है दिमाग में?”

“अल्का, आज आप इसी को पहन कर सो जाओ न!” अब मैं भी काफी हिम्मत दिखा रहा था।

“पहन का सो जाओ? मतलब नाईट ड्रेस?”

“हाँ! अगर इसको दिन में नहीं पहन सकती, तो रात में ही पहनो!”

अल्का कुछ देर तक सोच में पड़ी रही, और फिर दोनों कपड़े ले कर कमरे से बाहर निकल गई। कोई दो तीन मिनट बाद ही वो कमरे में वापस आई। वो कमरे में आ कर दरवाज़े के सामने कुछ देर के लिए खड़ी हो गई – जैसे वो स्वयं को मुझे दिखा रही हो और पूछ रही हो, ‘बताओ, कैसी लग रही हूँ?’