मंगलसूत्र (एक लघु-कथा) 7

हमारा घर, गाँव antarvasna के और घरों की तरह न हो कर हमारे खेत में ही था। इसलिए घर में और उसके आसपास काफी एकांत सा रहता था। हमारे घर के इर्द गिर्द कोई एक एकड़ के क्षेत्र में फलदार घने वृक्ष लगे हुए थे। उन पर ढेर सारे पक्षी आ कर बैठते थे। हम सभी को उनकी छाँव में चारपाई डाल कर पिकनिक मनाने में बहुत आनंद आता था। नानी तो आज भी दोपहर में वहीं सोती हैं। दोपहर खाने के बाद कम से कम दो घंटे तक सोना, यह उनका नियम सा बन गया है। खैर, गाँव के तौर तरीके सीखते सीखते मुझे करीब एक सप्ताह हो गया।

पहली रात जैसा विद्युतीय घटनाक्रम इस एक सप्ताह में नहीं हुआ। अल्का रात में ढीली ढाली मैक्सी में सोती। मुझे पूरे कपड़ों में सोने में दिक्कत होती है। जब मैंने उसको यह बात बताई तो उसी ने कहा कि मैं जैसा मेरा मन करे वैसे सो सकता हूँ। अब मैं रात में सिर्फ अपनी जाँघिया में सोता हूँ। कभी कभी मन होता है की सारे कपड़े उतार कर अल्का से लिपट जाऊँ, लेकिन हिम्मत नहीं होती।

एक सवेरे रसोईघर में मैं अल्का के साथ ही था, उसने नाश्ता तैयार करते हुए मुझसे पूछा,

“चिन्नू, तुमने हमारे खेत में नदी वाला हिस्सा देखा है क्या?”

हमारे खेत में नदी है – यह बात तो मुझे मालूम तक नहीं थी। मैंने उसको यह बात बताई। उसने मुझे बताया कि सलाद की खेती के लिए उसने वही ज़मीन सोची है। मैं यह सोच कर बहुत प्रसन्न हुआ… वो इसलिए कि अल्का मेरी बात मान रही थी। मैंने उसको कहा कि मुझे वो ज़मीन देखनी है – अल्का ने भी कहा कि वो मुझे आज वो हिस्सा दिखाना चाहती है, जिससे आगे का काम जल्दी हो सके। वो हिस्सा कुछ दूर पड़ता है, इसलिए उसने सुझाया कि दोपहर का खाना साथ ले कर उधर चलेंगे।

अल्का ने नानी को बातें समझाईं – मुझे नहीं मालूम कि नानी को उसकी बात कितनी समझ आई। लेकिन उन्होंने हमको मज़े करने को कहा! कामवाली (चिन्नम्मा) को ज़रूरी निर्देश और दोपहर में नानी को खाना खिलाने के निर्देश दे कर, अल्का और मैं उस तरफ चल दिए। खैर, चूँकि रास्ता अल्का को मालूम था इसलिए वो आगे और मैंने उसके पीछे चल रहा था। उसने हमेशा की तरह वही ढीले ढाले कपड़े पहने हुए थे, लेकिन मेरे मन में उसकी निक्कर और टी-शर्ट पहनी हुई छवि बसी हुई थी। मैंने यही सोच रहा था कि अगर वो इस समय उन्ही कपड़ों में होती तो किस तरह उसके नितम्ब उसकी हर चाल पर थिरकते! यह सोच कर एक बार फिर से मुझे उत्तेजना हो आई, लेकिन एक तो वहां एकांत था, और मैं पीछे था – इसलिए उत्तेजना छुपाने की कोई आवश्यकता नहीं थी। हमारा सारा खेत एक साथ नहीं था, और यह हिस्सा थोड़ा अलग थलग पड़ा हुआ था। खैर, आराम से चलते और बातें करते हुए हम पैंतालीस मिनट में उस जगह पहुँच गए।

वो जगह वाकई बहुत सुन्दर थी। वो नदी छोटी सी थी, और उसके अगल बगल हरी भरी घास उगी हुई थी। कुछ छोटे बड़े वृक्ष भी उगे हुए थे। और इन सब बातों का सम्मिलित प्रभाव यह था कि वह जगह बहुत शांत और निस्तब्ध थी! यहाँ खेत नहीं, रिसोर्ट बनाना चाहिए!! नदी के एक तरफ ढाल था, जिसमें पानी भर कर एक तालाब जैसा बन गया था। अल्का ने बताया की करीब आठ-नौ फ़ीट गहरा तालाब होगा। मेरी खेती के इरादे के लिए यह जगह एकदम सही लग रही थी।

मेरे मन में एक और बात आई – क्यों न अल्का और मैं इसी तालाब में साथ साथ नहाएं! उस जगह का भली भाँति निरीक्षण करने के बाद मैंने अल्का को विस्तार से पूरे प्लान के बारे में बताया। अल्का ने अपनी तरफ से कई सारे सुझाव दिए – लेकिन हम एक बात पर सहमत थे, कि सलाद की खेती से लाभ तो होगा! त्रिवेंद्रम, मद्रास जैसे बड़े शहरों में सलाद की खपत बढ़िया रहेगी, और खेत से शहर जाने में सिर्फ दो घंटे लगेंगे! मतलब एकदम ताज़ा सलाद, जो इस व्यापार के लिए सबसे आवश्यक नियम है!

खैर, यह बाते करते करते काफी समय बीत गया और मुझे अचानक ही भूख लगने लगी। अल्का ने वहीं घास पर पत्तलों पर खाना लगाया। अल्का को भी भूख लग गई थी। हम दोनों ही जल्दी जल्दी खाना खाने लगे। उसके बाद मैं वहीं पर लेट गया, और हर रात की तरह अल्का भी मेरी बगल लेट गई। वही लेटे लेटे हम उस जगह की शांति का आनंद उठाने लगे। दोपहर गरम थी। और ऐसे छाँव में लेटना बहुत सुखद था। लेटे हुए मैंने थोड़ा सा हिला तो मेरा हाथ, अल्का के हाथ को छूने लगा। न तो अल्का ने अपना हाथ हटाया, और न ही मैंने! कुछ देर ऐसे ही रहने के बाद मैंने उसके हाथ को सहलाना शुरू कर दिया। अल्का ने फिर भी अपना हाथ नहीं हटाया।

कुछ देर ऐसे ही रहने के बाद मैंने कहा, “अल्का, यह तालाब तो बढ़िया जगह है नहाने के लिए!”

“हाँ! यह ज़मीन हमको बहुत सस्ते में मिल गई थी। इसके पहले के मालिक लोग लंदन में बसने जा रहे थे, तो उन्होंने पिता जी को यह ज़मीन बेच दी। पता है, जब मैं छोटी थी तो यहाँ आ कर खूब नहाती थी! तब तो यह ज़मीन भी अपनी नहीं थी।”

“बिना कपड़ों के?” मेरे मुंह से अचानक ही निकल गया!

“हाँ! और कैसे?”

“मज़ा आता था?”

“बहुत! लेकिन फिर बाद में दीदी और माँ मुझे मना करने लगे!”

“हम्म्म…. तो अभी कभी नहाती हो यहाँ?”

“कभी कभी!”

“बिना कपड़ों के?”

अल्का हंसी, “चिन्नू बहुत शैतान हो गया है!”

“बताओ न मौसी!” मैंने छेड़ा।

“अरे फिर से मौसी!! मुझे मेरे नाम से ही बुलाया करो। मुझे अच्छा लगता है।”

“तुमने मेरी बात का जवाब नहीं दिया!”

“नहीं बाबा! नहीं नहाती! कोई देख लेगा तो?”

“कौन देखेगा? ये जगह तो ऐसे ही सूनसान सी रहती है!”

“हाँ! सूनसान सी रहती है, इसीलिए तो! अगर कुछ हो जाय, तो कोई बचाने वाला भी नहीं रहेगा!”

“हा हा! वो भी ठीक है!” कह कर मैं चुप हो गया। फिर कुछ हिम्मत कर के मैंने आगे कहा,

“आज नहा लो?”

“अच्छा! और तुम जो यहाँ हो, वो?”

“मैं ही तो हूँ! मैं बचा भी लूँगा! चलो न, नहाते हैं?”

“मेरे चिन्नू, अब हम बड़े हो गए हैं… और जब एक लड़का और एक लड़की बड़े हो जाएँ न, तो यह सब नहीं कर सकते! समझे?”

यह कहते कहते अल्का का चेहरा शर्म से लाल हो गया था। ये इस कारण हुआ की उसने मुझे ‘मेरे चिन्नू’ कहा, या फिर इस कारण की वो हम दोनों को उस तालाब में साथ में निर्वस्त्र नहाते हुए सोच रही थी, यह मैं कह नहीं सकता! मैं अल्का की बात से विचलित नहीं हुआ। मुझे अचानक ही लगने लगा की अल्का का और शरीर देखने का एक सुनहरा मौका है आज!

मैंने कहा, “अरे! हम दोनों अपने अंडरवियर में नहा सकते हैं! है न? वैसे भी यहाँ कौन है देखने वाला? जल्दी से नहा कर निकल लेंगे!”

अल्का की आँखें एक गहरी सोच में सिकुड़ सी गयीं। साफ तौर पर वो मेरे सुझाव के बारे में सोच रही थी। अंततः उसने कहा, “हाँ… नहा तो सकते हैं! लेकिन, नहायेंगे नहीं!”

उसकी बात पर मेरा चेहरा उतर गया।

“क्या हुआ चिन्नू राजा?” अल्का ने मुस्कुराते हुआ कहा, “लगता है तुम्हारी शादी कर देनी चाहिए! तब जी भर के अपनी पत्नी को नहाते हुए देखना! हा हा!”

“हा हा हा” मैंने चिढ़ते हुआ कहा, “तुम ही कर लो न मेरे संग शादी। फिर मैं ही देखूँगा तुमको… जी भर के!”

“अले अले! मेरा चिन्नू नाराज़ हो गया!”

“मैं क्यूँ नाराज़ होऊंगा भला? न नहाना है, तो न नहाओ!”

वैसे भी शाम ढलने वाली थी, इसलिए वापस चलना ही ठीक था। इसलिए हम दोनों उस जगह से वापस हो लिए।