मंगलसूत्र (एक लघु-कथा) 12

अल्का दिन भर antarvasna बाहर ही रही, और मैं खेत पर। अपने कर्मचारियों से बात करना, मेल जोल बढ़ाना, उनका हाल चाल और सेहत का ध्यान रखना ज़रूरी है, अगर आप खेती में बरकत चाहते हैं। शाम को जब वापस आया तो थक कर चूर हो गया था। अल्का रसोईघर में व्यस्त थी। आज रात बहुत उमस थी – अच्छा संकेत था कि बारिश बस आने ही वाली है! दिन भर अल्का से बात करने का कोई अवसर नहीं मिला। रात में भी नहीं। रात में अल्का मुस्कुराते हुए बिस्तर में आ कर लेट गई। मैंने उससे कारण नहीं पूछा। बहुत अधिक थका हुआ था, इसलिए नींद भी लगभग लेटते ही आ गई।

अगले दिन जब मैं उठा, तो अल्का रोज़ की तरह बाहर जा चुकी थी। मैंने भी जल्दी ही तैयार हो कर बाहर का रुख लिया – सोचा की कुछ लोगों से मुलाक़ात ही कर ली जाय! लोगों से मिलते मिलाते, कब दोपहर हो गई, पता ही नहीं चला। अच्छी बात यह हुई की कामवाली मुझे ढूंढते हुए सही जगह पहुँच गई, और उसने मुझे दोपहर के खाने के लिए घर बुलाया। आज हम तीनों (नानी, अल्का और मैं) एक साथ खाने की टेबल पर खाना खा रहे थे (दोपहर में शायद ही हमने साथ में खाया हो)। हमेशा शलवार-कुरता पहनने वाली अल्का, इस समय शर्ट और जीन्स पहने हुए थी। दोनों ही कपडे कुछ पुराने से लग रहे थे और उसके लिए कुछ कसे हुए भी थे। शर्ट में बस एक-चौथाई आस्तीन थी, और कालर थोड़े चौड़े से…. अल्का बहुत सुन्दर लग रही थी। मैंने उसको प्रसंशा भरी दृष्टि से देखा। शर्ट से परिलक्षित होता हुआ अल्का का सौंदर्य, मैं खाने की टेबल पर बैठे बैठे ‘पी’ रहा था। अल्का कल की घटनाओं से किसी भी तरह उद्विग्न नहीं लग रही थी। यह एक दिलासा देने वाली बात थी। उसको देख कर मैं भी संयत हो गया।

मेरी दृष्टि अल्का के चेहरे से होते हुए उसके वक्षों पर आ कर रुक गई। मन को लालसा ने आ घेरा। उसको भी पता चल गया कि मैं किस तरफ देख रहा हूँ – एक हलकी, पतली मुस्कान उसके होंठों पर तैर गई। कभी वो अपने बालों में हाथ फिराती, तो कभी होठों को जीभ से गीला करती, तो कभी अपनी शर्ट के बटन से खिलवाड़ करती। मैं कभी उसका चेहरा देखता, तो कभी उसकी छाती! मेरे लिंग में वो जानी-पहचानी हलचल पुनः होने लगी। इन सब के अतिरिक्त एक और बात मैंने ध्यान दी, और वह यह कि अल्का काफी प्रसन्न लग रही थी – पहले से कहीं अधिक!

“मैंने एक डीलर से बात करी है… सलाद के पौधों और बीजों के लिए! उसका एक आदमी अभी आता ही होगा। तुम उससे ठीक से बात कर लेना। याद है न, यह तुम्हारा प्रोजेक्ट है। मैंने सिर्फ तुम्हारी असिस्टेंट बन कर रहूंगी!” उसने बातों ही बातों में मुस्कुराते हुए कहा।

मुझे सुन कर आश्चर्य हुआ! मेरे दिमाग से वो बात तो निकल ही गई थी। वो कहते हैं न, आदमियों को बस एक ही बात याद रहती है! कहाँ मैं अल्का के सीने के उतार चढ़ाव की बातें सोच रहा था, और उधर न जाने कैसे अल्का को यह बात याद थी कि मैं केरल में किस कार्यवश आया था। और तो और, उसने इस दिशा में कार्य भी शुरू कर दिया था। नानी ठीक से सुन नहीं पाती थीं, इसलिए उनको चिल्ला चिल्ला कर बताना पड़ रहा था। खैर, उनको यह जान कर ख़ुशी मिली, कि मैं यहाँ पर अपना काम करना चाहता हूँ। उन्होंने मुझे बहुत सारा आशीर्वाद, और शुभकामनाएं दीं। खाना खत्म कर के हम दोनों गाँव की सड़क की तरफ चल दिए, जहाँ डीलर का आदमी हमसे मिलने आने वाला था। वहां पहुँचने के कोई आधे घंटे में वो आदमी वहां पहुँच गया। उस डीलर ने सलाद की पौध, और बीज का नया नया काम शुरू किया था, इसलिए हमको मेरे आंकलन से कहीं कम दाम में बीज उपलब्ध हो गए। मानसून केरल में अगले पंद्रह-बीस दिनों में पहुँच जाने वाला था, इसके पहले ही मैं रोपड़ का कार्य समाप्त कर लेना चाहता था। डीलर ने वायदा किया कि अगले एक सप्ताह में हमको सब पौधे और बीज मिल जायेंगे।

सलाद की खेती के लिए हल बैल की आवश्यकता तो नहीं होती, लेकिन उनका ध्यान बहुत रखना पड़ता है। अच्छी बात यह थी कि, जिस भूमि क्षेत्र में हम सलाद उगाना चाहते थे, वह काफी उपजाऊ थी। बस, बाकी खेत से कुछ अलग थलग रहने के कारण यहाँ कुछ उगाया नहीं जाता था। दो आदमी, पांच से सात दिनों के प्रयास से ही इस खेत को तैयार कर सकते थे। डीलर से सब प्रकार की बाते पूछने, और जानने के बाद, हमने अपनी आज्ञाप्ति उसको दे दी। सलाद की खेती उस समय नहीं होती थी, इसलिए उस डीलर ने भी मूल्य में काफी छूट दी थी। खैर, सारी बातें पक्की कर के, और कुछ रकम पेशगी दे कर हमने उससे विदा ली।

उसके बाद, हम दोनों सड़क पर बात करते हुए, धीरे धीरे चल रहे थे। रास्ता कच्चा था, इसलिए रह रह कर हम दोनों की बाहें आपस में रगड़ खा रही थीं। अल्का ने कहा कि कल से ही वो दो लोगों को काम पर लगा देगी। वैसे तो इस कार्य में उन्नत तकनीक प्रयोग में लायी जाती है, लेकिन मैं धीरे धीरे इसका विकास करना चाहता था, जिससे लागत कम आये और खपत का ठीक ठीक अनुमान लगाया जा सके। मैंने राह में चलते चलते अल्का को यह सब बातें बताईं, और यह भी कहा कि मैं भी खेत पर काम करूंगा, जिससे मुझे कार्य का ठीक ठीक अनुमान लग सके। अल्का ने हँसते हुए मेरी बात मान ली, और मुझे छेड़ते हुए बोली कि दोपहर में वो मेरे लिए खाना लाया करेगी, और अपने हाथ से मुझे खिलायेगी। भले ही वो मुझे छेड़ रही थी, लेकिन यह बात सुन कर मुझे अच्छा लगा।

यह सब बातें करते करते जब हम अपने खेत पर पहुंचे तो करीब चार बज गए थे। काम करने वाले लोग तब तक अपने घर लौट गए थे। अपने विस्तृत खेत में हम दोनों इस समय एकदम अकेले थे। दोपहर/साँझ के सन्नाटे में हलकी हलकी हवा – बहुत सुखद लग रही थी। अल्का बोली,

“कल से वहां काम शुरू हो जाएगा।”

“हाँ!” मुझे लगा कि यह एक साधारण सा वाक्य है। फिर मुझे लगा कि संभवतः वो कुछ और भी कहना चाहती है। तो मैंने कुछ रुक कर आगे कहा, “तो?”

“तो… अब उस जगह पर नहाना और तैरना आसान नहीं होगा!”

“हैं? वो क्यों?”

“अरे! अब तो वहां भी लोग आते जाते रहेंगे न!”

‘ओओओह्ह्ह! बात तो सही है’

“वो तो है!”

अल्का कुछ झिझकी, “तुमको वहां नहाना हो तो आज नहा लो!”

“अरे! लेकिन मेरे साथ कोई क्या करेगा? मैं तो कभी भी नहा सकता हूँ!” मैंने आँख मारते हुए अल्का को छेड़ा।

“हाँ! बन्दर के साथ कोई क्या ही करेगा! हा हा हा हा!” अल्का जोर से हंसने लगी।

“और तू है बंदरिया!” मैंने चिढ कर बोला।

“मेरा प्यारा बन्दर! लाल लाल पुट्ठे वाला! हे हे हे ही ही ही!”

“आओ बताता हूँ… इतनी मार लगाऊँगा, कि तेरी भी लाल हो जायेगी!”

“भी? आहाहाहाहाहा” अल्का के ठहाके थम नहीं रहे थे।

मैंने चिढ कर उसको दौड़ा लिया। वो भागी। खेत की मेढ़ों और कच्चे रास्ते उसके लिए आम बात थे, इसलिए शुरू शुरू में वो मुझसे आगे निकल रही थी। लेकिन जीन्स के कारण गति बन नहीं पाई, और मैंने जल्दी ही उसको धर दबोचा। अल्का को वहीं ज़मीन पर पटक कर उसको उल्टा किया और उसके दोनों चूतड़ों पर बारी बारी से मैंने तीन तीन चपत लगाई।

“ऊईईई अम्मा! हा हा… माफ़ कर दो! ऊई! अब नहीं कहूँगी.. हा हा!”