मंगलसूत्र (एक लघु-कथा) 2

जब तक मैं छोटा था, antarvasna तब तक प्रत्येक वर्ष हम दो बार केरल अवश्य जाते थे। लेकिन मेरे बड़े होने के साथ साथ माता-पिता की जिम्मेदारियां भी बढ़ने लगीं और मेरी पढाई का बोझ भी। नाना जी की मृत्यु (तब मैं ग्यारह-बारह साल का रहा होऊंगा!) के समय हम सभी दो बार साथ में गए, और उसके बाद केरल जाना कम होता गया। नाना की अच्छी खासी बड़ी खेती थी, और उसको सम्हालने का कार्य अब मौसी के सर था। आश्चर्य की बात है की ऐसा सश्रम कार्य, इतनी कम उम्र में भी मेरी मौसी बखूबी और कुशलता से निभा रही थीं।

मेरी नानी कोई पैसठ साल की बुढ़िया हो चुकीं थीं, और अब उनकी सभी इन्द्रियां शिथिल पड़ गयीं थीं। उनको अब ठीक से दिखाई, और सुनाई नहीं देता था। हाथ कांपते थे, गठिया और मृदुलास्थि के कारण ठीक से चल फिर भी नहीं पाती थीं। उनकी देखभाल और खेती के कार्य के बढ़ते बोझ के कारण मौसी ने विवाह करने से भी मना कर दिया था। उनका कहना था कि यह दो जिम्मेदारियां उनके लिए बहुत हैं! ज्ञात रहे, की अगर कोई लड़की पच्चीस छब्बीस साल की हो जाए, और अविवाहित रहे, तो केरल के ग्रामीण परिद्रेश्य में वो विवाह योग्य नहीं रहती। ग्रामीण क्या, शहरी परिद्रेश्य में भी नहीं! वैसे तो कुछेक लोग अभी भी उनके लिए विवाह प्रस्ताव लाते थे, लेकिन उनकी दृष्टि सिर्फ मौसी की धन-सम्पदा पर ही थी। यही कारण था कि वो भी ऐसे सभी प्रस्तावों को मना करती रहती थीं।

मैं जब भी अल्का मौसी को देखता, तो मुझे लगता कि हो न हो – उन्ही के जैसी कोई लड़की मेरे लिए ठीक है… हर प्रकार से! जिस प्रकार से वो विभिन्न जिम्मेदारियों को निभाती हैं, वो एक तरह से बहुत ही आकर्षक, रोचक और एक तरह से दिलासा देने वाला भाव उत्पन्न करता है। अल्का मौसी मेरे लिए एक आदर्श लड़की थीं।

उनकी देखा-देखी मुझे भी मन होता था की मैं भी खेती करूँ। इसलिए बड़े होते होते मैंने भी यह ठान लिया था कि कृषि क्षेत्र में ही स्नातक की पढाई कर खेती का व्यवसाय ही करूंगा। इस हेतु मैंने दुनिया भर में कृषि क्षेत्र में चल रहे वैज्ञानिक उन्नति के बारे में पढ़ना और समझना शुरू कर दिया था, और जल्दी ही मेरे मष्तिष्क में कृषि के आधुनिकीकरण को लेकर कई सारे विचार और प्रयोग उत्पन्न हो गए। लेकिन, मेरे इस निर्णय से मेरे माता पिता सबसे अधिक चिन्तित रहते थे – उनको लगता था की यह बहुत बुद्धिमत्तापूर्ण निर्णय नहीं था, और नौकरी करना ही श्रेयस्कर था। उन दिनों अभियांत्रिकी की शिक्षा ले कर नौकरी करने का ज़ोर बढ़ रहा था.. और इस बाबत उन दोनों ने मुझे मनाने की बहुत कोशिश करी, लेकिन मेरे निश्चय और (कु)तर्क के सामने बेबस हो गए। खैर, मेरे बारहवीं करते करते उन्होंने मुझे एक साल का अवसर दिया की मैं अपनी सोच और प्रयोग केरल में हमारी खेती में पर आज़मा सका तो वो मुझे इसी क्षेत्र में जाने की अनुमति दे देंगे, अन्यथा मुझे उनकी बात माननी पड़ेगी। मेरे पास उनकी बात मानने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं था।

अल्का मौसी ने मेरे निर्णय पर मेरे सामने तो ख़ुशी ज़ाहिर करी, लेकिन मेरे माता-पिता के सामने नहीं। दरअसल, बिना मेरे माता पिता को बताए, वो मेरे सुझावों को खेती में पिछले तीन-चार साल से इस्तेमाल कर रहीं थी, और इसके कारण हमारी खेती में पहले से ही बहुत उन्नति हो चुकी थी। मेरा केरल जाना कम हो गया था, लेकिन फ़ोन और डाक के जरिए मौसी और मेरी बात-चीत चलती रहती थी। मेरे सुझावों के कारण, पिछले इन तीन वर्षों में हमारी कृषि आय प्रतिवर्ष औसतन कोई बीस प्रतिशत बढ़ी थी। यह कोई सामान्य बात नहीं थी। अगर वो यह बात मेरे माता पिता को बता देतीं, तो उनके सामने मेरी बात मानने का कोई चारा न रहता! लेकिन मेरे ही आग्रह के कारण उन्होंने यह रहस्य मेरे माता-पिता के सामने नहीं खोला।