मंगलसूत्र (एक लघु-कथा) 3

खैर, केरल जाने से antarvasna पूर्व मुझे उनसे एक बार पुनः एक लम्बा चौड़ा भाषण सुनना पड़ा और अंततः मैं केरल के लिए रवाना हो गया। पहले साल में सिर्फ एक दो बार वहां जाता था एक एक सप्ताह के लिए, लेकिन इस बार पूरे एक साल के लिए जा रहा था, और वो भी अपने सपने को साकार करने के लिए। मैं बहुत खुश था! तब उत्तर भारत से केरल तक जाने में काफी समय लग जाता था। बस, ट्रेन और बैलगाड़ी जैसे भिन्न भिन्न साधनों से ढाई दिन की एक लम्बी यात्रा के बाद मैं अपने ननिहाल पहुंचा।

“मौसी!”

मैंने जैसे ही अल्का मौसी को दरवाज़े पर देखा, मेरे चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान फ़ैल गई। मौसी का चेहरा पहले से ही ख़ुशी में सौ वाट के बल्ब जैसा चमक रहा था।

“चिन्नू!!”

मेरा नाम वैसे तो अर्चित है, लेकिन मौसी मुझे सिर्फ चिन्नू ही कहती हैं। वो मुझसे मिलने के लिए दौड़ती हुई मेरे पास आयीं। उनके पास आकर मैं उनके पैर छूने के लिए झुका तो उन्होंने मुझे बीच में ही रोक लिया और अपने गले से लगा लिया।

“इतने दिनों के बाद आए! मेरी याद नहीं आती?” मौसी ने लाड़ से शिकायत करी।

“याद आती क्यों नहीं! इसीलिए तो इस बार कम से कम साल भर रहूंगा!”

उनके गले लग कर मुझे महसूस हुआ, कि वाकई उनकी कितनी कमी महसूस होती रही। मैंने उसी आवेश में उनको और ज़ोर से गले लगा लिया। और उनके गाल को चूम लिया। मौसी मुस्कुराई। और मुझे कंधे से पकडे हुए ही एक दो कदम पीछे हट कर मुझे देखने लगी।

“तुम तो कितने बड़े हो गए!! मुझसे भी ऊंचे!”

“हा हा हा!”

“और सिर्फ ऊंचे ही नहीं,” उन्होंने मेरी भुजाओं को महसूस करते हुए कहना जारी रखा, “मज़बूत भी!”

“एक्सरसाइज करता हूँ न!” मैंने इम्प्रैशन झाड़ा!

“हाँ! तभी तो!” वो मुझे ऐसे देख रही थीं, जैसे मेरे पूरे शरीर का अनुपात पता लगा लेंगी।

“पिछली बार जब तुम आये थे तो कैसे दुबले पतले थे… लेकिन अभी देखो! पूरे मर्द बन गए हो! और हैंडसम भी!” उन्होंने आँख मारते हुए कहा।

“क्या मौसी!” मैंने झेंप गया, लेकिन मैंने भी उनकी खिंचाई करी, “वैसे, तुम भी कुछ कम नहीं लग रही हो।”

“हा हा! हाँ, यहाँ की धूप, धूल-मिट्टी, और गर्मी मुझे बहुत रास आ रही है! देखो तो.. कैसे मेरा रंग रूप निखर गया है…! चल अंदर आ!”

मौसी तो अपने साँवले रंग की तरफ इशारा कर रही थीं, लेकिन मेरा इशारा उनकी गढ़न की तरफ था। पहले का मुझे नहीं याद है, लेकिन अभी मौसी का शरीर इतना सुन्दर विकसित हुआ कि शब्दों में ठीक से बयान नहीं किया जा सकता.. इतना तो तय है कि उनकी छातियाँ पहले से अधिक विकसित हो गई थी। जब मैं छोटा था, तब तो मौसी भी छोटी ही थीं। हम दोनों को हमारी उम्र में वाकई कोई अंतर नहीं लगता था। छुटपन में एक दूसरे के सामने यूँ ही नंगे घूमना, और वैसे ही साथ में खेलना हमारे लिए एक आम बात थी। लेकिन धीरे धीरे हमारे शरीरों में परिवर्तन होने लगे। छोटा लड़का होने के नाते मेरे शरीर में परिवर्तन धीरे हो रहा था, लेकिन मेरी हर केरल यात्रा के दौरान मैं अल्का मौसी के शरीर में जो अंतर देखता था, वो मुझे बहुत रोचक जान पड़ता।

ख़ास तौर पर पिछले तीन चार वर्षों में उनका जैसे कायाकल्प हो गया था! यौवन ने जैसे जीवन के स्त्रोत से जैसे रस सोख लिया था। मौसी का रूप हर बार मुझे और निखर हुआ लगता था … मुझे ही नहीं, बल्कि हम सभी को! उनका चेहरा कई मायनों में बदल गया था… ऐसे नहीं की उनकी शकल ही बदल गई हो, बस वो छोटे छोटे, लगभग अपरिभाष्य तरीके से! उनके चेहरे पर से धीरे-धीरे बालपन की सुंदरता की जगह, यौवन के लावण्य ने ले ली थी। उनके होंठ अब और अधिक रसीले हो गए थे, उनकी मुस्कान पहले से प्यारी और आकर्षक हो गई थी।

मेरे सामने वो बहुत पहले से ही नंग्न होना बंद कर चुकी थी – लेकिन ऐसा नहीं था कि उन्होंने मुझे अपने नवोदित स्तनों को छूने या महसूस करने से रोका हो। हमारी हर केरल यात्रा में किसी न किसी बहाने से मैं उनके स्तनों को छूता या टटोलता ज़रूर था, और उनको यह बात भली भांति मालूम भी थी। और सबसे अच्छी बात यह थी कि वो मुझे रोकती भी नहीं थीं। वो अलग बात है की पिछले दो बार से मैंने ऐसी कोई चेष्टा नहीं करी। मैं हर बार उनके आकार बदलते स्तनों को एक नया नाम देता – कभी नींबू, तो कभी संतरे! वो भी मेरे मज़ाक का बुरा नहीं मानती थीं – बल्कि मेरे साथ साथ खुद भी इस बात पर हंसती थीं।