मंगलसूत्र (एक लघु-कथा) 13

खैर, उसके माफ़ी antarvasna मांगने पर मैंने उसको छोड़ दिया। उसकी शर्ट वैसे ही तंग थी, और इस उठा पटक में वो थोडा ऊपर चढ़ गई थी, और धूल से गन्दी भी हो गई। उस दिन मैंने पहली बार अल्का का नंगा पेट और पीठ देखा! हाथ के मुकाबले काफी गोरा शरीर! जाहिर सी बात है – केरल की धूप में कोई अगर दिन भर बाहर काम करे तो ऐसा तो होना ही है।

“हाय चिन्नू! कितनी जोर से मारा! ऐसे कोई मारता है क्या?” अल्का अपने नितम्ब सहलाते हुए बोली; वो इस बात से अनभिज्ञ थी की मैं उसकी सुन्दरता का आस्वादन कर रहा था!

“सॉरी मेरी आलू!” कह कर मैंने उसके पुट्ठों को सहलाया।

“अच्छा! पहले तो मारा, और अभी चांस ले रहा है! शैतान!”

मैं अचानक ही थोडा गंभीर हो गया – और मैंने उसके पुट्ठों से हाथ भी नहीं हटाया, और बस सहलाता रहा।

“आई ऍम सॉरी अल्का!”

मैंने उतनी ही गंभीरता से कहा। मुझे वाकई नहीं समझ में आया की मैंने उसको इस तरह से क्यों मारा। क्यों मुझे ऐसे गुस्सा आया। क्यों मुझे ऐसे चिढन हुई। अल्का ने मुझे सहलाने से रोका नहीं, लेकिन अपने हाथ से मेरे गाल को हलके से छू कर कहा,

“कोई बात नहीं चिन्नू! चलो.. घर चलते हैं!”

लेकिन मैं वहीं ज़मीन पर पालथी मार कर बैठ गया, और अल्का को अपनी गोद में बैठा लिया। मैं साथ ही साथ उसकी पीठ, हाथ और नितम्ब सहलाता रहा।

“क्या हो गया, चिन्नू?”

“आई ऍम सॉरी!”

“इट इस ओके!” कह कर अल्का ने मुझे माथे पर एक बार चूम लिया।

“मैंने एक और बात सोची है..”

“वो क्या?”

“मैं इस तालाब में नहीं नहाऊँगा…”

“अरे? ऐसे क्यों?”

“बिना तुम्हारे कभी नहीं!”

“हा हा! मेरे चिन्नू! तुम्हारी सुई तो एक जगह ही अटकी हुई है!” उसने हँसते हुए कहा।

“बिलकुल!” मन में पुनः कल की सारी बातें कौंध गयीं,

“तो ठीक है… मैं भी नहा लूंगी साथ में!”

“अभी?”

“हाँ!”

“लेकिन, इन कपड़ों में?”

“कल कैसे नहाया था?”

“मुझे लगा कि तुमको शायद अच्छा नहीं लगा।”

“मेरे चिन्नू…. मुझे तुम्हारे साथ सब अच्छा लगता है। सब कुछ!”

“ऐसी बात है?”

“हाँ”

“मेरा कहा भी मानोगी?”

“हाँ!”

“मैं कुछ कहूँगा, तो करोगी?”

“अगर कर सकी, तो ज़रूर करूंगी” अल्का की आवाज़ गंभीर होती जा रही थी। कुछ रुक कर, “….बोलो?””बिना कपड़ों के नहा सकोगी मेरे साथ?” मैंने न जाने किस आवेश में कह दिया। मेरी बात सुन कर अल्का का सर नीचे झुक गया। वो चुप हो गई। मेरे दिल की धड़कनें बहुत बढ़ गयीं। हम लोग बिना कुछ बोले चलते रहे – हमारे तालाब की तरफ! करीब पांच मिनट बाद अल्का बेहद गंभीर स्वर में बोली,

“कल जितना नंगा देख कर तुम्हारा मन नहीं भरा? मुझे पूरी नंगी देखना चाहते हो?”

“हाँ…. और हाँ…” मैं लगभग चिल्लाते हुए बोला। यह मेरा खुद को दृढ़ दिखाने का बेवकूफी भरा प्रयास था।

इस पूरे वार्तालाप में अल्का नीचे की ही तरफ देखती रही। मैंने बोल तो दिया था, लेकिन मुझे पूरा संदेह था की वो ऐसा कुछ कर भी सकती है। लेकिन अगर उसने यह कर दिया तो मज़ा आ जायेगा। आज पहली बार एक लड़की के अनावृत स्तन और योनि देखने को मिल सकेगा! संभव है, कि वो अपने अंगों को छूने भी दे! काफी देर के बाद हम अंततः अपने तालाब पर पहुँच गए। वहां पहुँच कर हम दोनों ही रुक गए। अल्का सर झुकाए वहां खड़ी हुई थी। मुझे लगा कि मैंने हमारी दोस्ती की सीमा का उल्लंघन कर दिया है, और इसीलिए अल्का उदास या नाराज़ है। यह बात मेरे मन में जैसी ही आई, मैंने उसको अपने गले से लगा लिया।

“अल्का, तुमको ऐसा कुछ करने की ज़रुरत नहीं! आई ऍम सॉरी! मुझे ऐसा नहीं कहना चाहिए था।”

“नहीं चिन्नू… सॉरी मत कहो! मुझे मालूम है की तुम क्या चाहते हो! लेकिन… मैं नहीं जानती कि तुम्हारी इच्छा पूरी कर पाऊँगी या नहीं!”

“मोलू, ऐसे मत कहो!” मैंने पहली बार अल्का को उसके प्यार के नाम से बुलाया था, “तुमको कुछ करने की ज़रुरत नहीं! समझी?”

“नहीं चिन्नू… मेरी बात सुनो! तुम… मैं… क्या तुम, मेरे कपड़े उतारोगे?”

“अल्का! तुम क्या कह रही हो?” मेरा सर चकरा गया।

“प्लीज मेरी बात सुन लो!” अल्का ने एक गहरी साँस भरी, और बोली, “मैं चाहती थी कि मुझे बिना कपड़ो के वो देखे जिसे मैं प्यार करती हूँ.…”

उसकी बात सुन कर मैं भौंचक्क रह गया। ये क्या कह रही है अल्का! मुझसे प्यार!?

“तू तु तु तुम…. मुझसे प्यार?”

“हाँ मेरे भोले बाबा! लेकिन, इतनी जल्दी नहीं! आराम से!”

“आराम से? मतलब?”

“मतलब ये मेरे चिन्नू, कि यह सच है कि मैं तुमको चाहती हूँ…. लेकिन तुमको भी तो मुझसे प्यार होना चाहिए! है न?”

“पर मैं भी तुमसे प्यार करता हूँ।”

“मुझे मालूम है। … लेकिन, उस तरह से नहीं!”

“उस तरह से नहीं? मतलब? किस तरह से नहीं?”

“उस तरह जैसे एक प्रेमी, अपनी प्रेमिका को करता है!”

“मैं करूंगा!”

“मुझे मालूम है… तुम ‘करोगे’… लेकिन, तुम अभी तक नहीं करते!” अल्का मंद मंद मुस्कुरा रही थी।

“अल्का,” मैंने संजीदा होते हुए कहना शुरू किया, “मैं तुमको कभी भी, किसी भी तरह से दुःख नहीं दूंगा!”

“मुझे मालूम है, कुट्टन!” अल्का इस समय बहुत प्यार से बोल रही थी, बहुत ही संयत स्वर में!

“तुम बहुत अच्छे हो! लेकिन मैं तुम पर किसी तरह का दबाव नहीं डालूँगी! लेकिन मैं तुमसे प्यार करती हूँ! बहुत अरसे से करती हूँ।”

मेरे मष्तिष्क में इस समय घंटियां बज रही थीं। ह्रदय धाड़ धाड़ कर धड़क रहा था।

“कितना अच्छा हो, अगर हम दोनों साथ रह सकें! हमेशा!” अल्का बोलती जा रही थी।

“अल्का, मैं तुम्हारे साथ हूँ! और हमारा साथ में रहना आज से शुरू! आज से… हमेशा के लिए!” मैंने मन ही मन निर्णय ले लिया था।

“सच में कुट्टन? सोच लो! मुझसे पीछा नहीं छुड़ा पाओगे कभी!”

“मेरी मोलू, मुझे तुमसे पीछा छुड़ाना भी नहीं है।”

अल्का की मुस्कराहट कुछ गहरी हो गई, “अभी तुमको मेरा शरीर नहीं मिला है, इसलिए तुम ऐसे कह रहे हो!”

मुझसे कुछ कहा नहीं गया।

“इसीलिए कह रही हूँ, इतनी जल्दी जल्दी नहीं!” उसकी बात से मैं निराश हो गया।

“मैं तुमको मना नहीं करूंगी – तुम खेलो मेरे शरीर से! लेकिन तुम मेरे मन के मालिक तभी बनोगे, जब तुमको भी मुझसे प्रेम हो जाय!”

“अल्का! बचपन से ही तुम मेरी सबसे ख़ास दोस्त रही हो! किसी से भी ज्यादा ‘तुमको’ मेरे बारे में मालूम है। मुझे दुनिया में तुमसे ही सबसे ज्यादा प्यार है।” मैं जितनी गंभीरता और सच्चाई से यह बात कर सकता था, वो मैंने कहा।

“क्या सच, चिन्नू?”अल्का वाकई मेरी इस बात पर आश्चर्यचकित हो गई, “तुमको मालूम है? तुम्हारी इस एक बात ने मुझ पर क्या असर किया है?”