मंगलसूत्र (एक लघु-कथा) 8

शाम को मैंने भी खाना antarvasna पकाने में अल्का और कामवाली की सहायता करी। हमारा परिवार शाकाहारी है – किसी सम्प्रदाय की बंदिशों के कारण नहीं… बस, पिछले दो तीन पुश्तों से हम लोग शाकाहारी हो गए। संभवतः यह सभी की इतना अच्छा लगा, की हमने पुनः मांस का सेवन नहीं किया। मैंने अल्का के सञ्चालन में सांबर और अवियल पकाया, और उन दोनों ने चावल, तोरन, अदरक की चटनी और नारियल की बर्फी बनायी। खाने के समय नानी ने हमको अपने बचपन और जवानी के कई किस्से सुनाये, जो अल्का पहले भी कई बार सुन चुकी थी, लेकिन मेरे लिए नए थे। इसलिए मैंने पूरी दिलचस्पी के साथ नानी की बाते सुनी।

ऐसे बातें करते हुए न जाने क्यों अल्का ने कामवाली से कहा, “चिन्नम्मा, कल चिन्नू का अभ्यंगम कर देना.. आया हुआ है, उसकी कुछ सेवा करी जाय।“

अभ्यंगम पूरे शरीर की तेल-मालिश को कहते हैं। यह कामवाली हमारे परिवार में कई वर्षों से है, और जब मैं छोटा था तब से उसने कई बार मेरी तेल मालिश करी है। बस एक ही दिक्कत थी और वह यह कि सबसे पहले चिन्नम्मा मुझे नंगा कर देती थी, फिर चाहे घर में कोई भी हो। और मालिश से ले कर नहलाने तक का सारा काम वो ही करती थीं। पूरा काम करने में कोई दो घंटा लग जाता था, और उस पूरे दो घंटे तक मैं नंगा ही रहता था। डर इस बात का था कि कहीं चिन्नम्मा वापस अपनी तर्ज पर ही न शुरू हो जाय।

“ठीक है मोलूटी!”

रात में सोते समय अल्का मुझसे ऐसे बात कर रही थी जैसे पूरा दिन सामान्य ही था। आज भी उसने मैक्सी ही पहनी थी। मैंने अल्का से कुछ पर्सनल बात करने की सोची,

“अल्का, तुमने अभी तक शादी क्यों नहीं करी?”

“अरे चिन्नू… अब तुम भी मत शुरू हो जाओ!”

“सॉरी मौसी!”

अल्का कुछ देर चुप रही, और फिर बोली, “नहीं.. सॉरी वाली बात नहीं है। शादी तो बराबरी की बात है न? तो फिर क्यों लड़की को आदमी की नौकर बन के रहना पड़ता है? लोग सिर्फ गोरा रंग देखते हैं, या फिर धन! गोरा रंग मेरे पास है नहीं, और धन तुम सबका है। फिर कौन करता मुझसे शादी? अब, मुझे भी नहीं करनी है किसी से…”

“अगर तुमको ऐसा आदमी मिल जाए जो तुम्हारे रंग, तुम्हारे धन से नहीं, सिर्फ तुमसे प्यार करे, तो?”

“सो जाओ चिन्नू..”

मैं चुप हो गया। कुछ देर के बाद मुझे लगा कि अल्का सुबक रही है। मुझे ग्लानि का अनुभव हुआ। मैंने उसको ‘सॉरी’ कहा, और फिर अपने से दुबका कर सुलाने की कोशिश करने लगा। कब नींद आई, याद नहीं।“चिन्नू, लो ये इडली बनाई है तुम्हारे लिए। खा लो, फिर तुम्हारा ‘मसाज’ होगा।“

“आज तुम खेत पर नहीं गई?”

“नहीं, आज छुट्टी है। आज मस्ती करेंगे.. या जो तुम कहो वो। ठीक है? लेकिन पहले चिन्नम्मा…”

मैंने जल्दी जल्दी नित्यकर्म किया और मजे में स्वादिष्ट इडली खाई, और कॉफ़ी पी। फिर चिन्नम्मा सुगन्धित तेल की कटोरी लेकर आई और बोली,

“चिन्नू, आँगन में मालिश करें, या बाहर, अहाते में?”

मौसम अच्छा था, इसलिए मैंने कहा, “अहाते में”

अहाते में चिन्नम्मा ने चटाई बिछाई और फिर मुझसे कपड़े उतारने को कहा। बढ़िया हवा बयार चल रही थी, और चिड़ियाँ चहक रही थीं। मैंने जाँघिया को छोड़ कर सब कपड़े उतार दिए।

“ये भी।“

“ये भी?”

“हाँ! नहीं तो मालिश कैसे होगी?”

“अरे ऐसे ही कर दो न!”

“ऐसे कैसे कर दूँ? हमेशा ही तो पूरा नंगा कर के तुम्हारी मालिश होती है।”

“क्या चिन्नम्मा! अब मैं बड़ा हो गया हूँ।“

“बड़े हो गए हो?”

“और क्या?”

“अच्छा!”

“हाँ!”

“देखूँ तो… कितने बड़े हो गए हो।“

यह कह कर वो खुद ही मेरे जाँघिया का नाड़ा खोल कर मुझे नंगा करने लगीं। दो ही सेकंड में मेरे लिंग में इतना रक्त बह गया कि वो गन्ने की पोरी के जितना लम्बा, मोटा और ठोस हो गया। चिन्नम्मा ने मेरे लिंग को अपनी हथेली में पकड़ कर दो तीन बार दबाया और कहा,

“बढ़िया!”

बढ़िया तो था, लेकिन यह अनुभव मेरे लिए इतना अनोखा था कि अपने अंडकोषों में बनने वाले दबाव को रोक नहीं सका। जब चिन्नम्मा ने एक और बार मेरे लिंग को दबाया तो मेरे वृषण ने पिछले दस दिनों से संचित वीर्य को प्रबलता से बाहर फेंक दिया। कम से कम सात आठ बार मेरे लिंग ने अपना वीर्य उगला होगा, और हर बार प्रबलता में कोई ख़ास कमी नहीं हुई। वीर्य इतनी तीव्रता से बाहर निकला कि सामने बैठी चिन्नम्मा उस वर्षा में पूरी तरह से भीग गई। मेरा वीर्य उसके बाल, चेहरे, ब्लाउज, और साड़ी पर जा कर गिरा।

“अरे मेरे चक्कारे, बता तो देता!” चिन्नम्मा ने सम्हलते हुए कहा।

मैंने काफी देर तक गहरी साँसे भर कर खुद को संयत किया और फिर कहा, “कैसे बताता चिन्नम्मा! तुमने एक तो मुझे नंगा कर दिया, और फिर ऐसे छेड़-खानी करने लगी।“

“छेड़-खानी नहीं, मैं तो तुम्हारा कुन्ना देख रही थी। मेरा चिन्नू सचमुच बड़ा हो गया है। कोई बात नहीं। चलो, अब तुम्हारी मालिश कर दूं।“ चिन्नम्मा ने आँचल से वीर्य को पोंछते हुए कहा।

कैराली मसाज के विभिन्न रूप बाज़ार में उपलब्ध हैं – आज कल इसको एरोमा थेरेपी के नाम से भी जाना जाता है। लेकिन चिन्नम्मा के तेल में कोई एरोमा वेरोमा नहीं था। यह एक साधारण तिल के तेल, सरसों के तेल, शुद्ध हींग और हल्दी का मिश्रण था। और कुछ भी नहीं। आज कल काम की चीज़ें कम, और नौटंकी ज्यादा करी जाती है! खैर, हमको क्या.. काम करने वालो को लाभ होता है, तो मना कैसे किया जाए?

चिन्नम्मा ने तेल की कटोरी को एक सुलगते हुए कंडे के ऊपर रखा हुआ था, जिससे तेल हल्का गरम था। उसी को लेकर उन्होंने मेरे पूरे शरीर की दमदार मालिश करी। सच कहूं, यात्रा की थकावट तो मालिश के बाद ही निकली। मेरी एक एक माँस-पेशी, एक एक जोड़, और एक एक अंग की ऐसी मालिश करी कि मुझे लगा कि पूरा शरीर आराम के अतिरेक से शिथिल हो गया है। उनके हाथों में एक अभूतपूर्व जादू है – किस अंग को कैसे दबाना और रगड़ना है, उनको अच्छी तरह से मालूम था। एक बात, जिस पर मेरा और चिन्नम्मा दोनों का ही ध्यान गया कि स्खलन के बाद भी मेरे लिंग स्तंभित ही रहा था। बीच में कुछ देर के लिए शिथिल पड़ा रहेगा, लेकिन जब उन्होंने वापस वृषण और लिंग की मालिश शुरू करी, तो फिर से तन कर तैयार हो गया। हाँ वो अलग बात है कि इस बार मैं भी, और चिन्नम्मा भी तैयार थीं। इसलिए कोई हादसा नहीं हुआ। और भी अच्छी बात यह हुई कि पूरे मालिश के दौरान कोई घर नहीं आया। कम से कम किसी और के आगे मर्यादा और इज्ज़त नहीं गई। मुझे नहीं मालूम कि अल्का ने मुझे वैसी हालत में देखा या नहीं। लेकिन वो पूरे समय तक बाहर नहीं निकली थी। अच्छी बात है!

मालिश हो जाने के बाद मैंने अपने कपडे पहने, और घर के अन्दर गया। अन्दर अल्का कॉफ़ी पीने के साथ साथ रेडियो पर गाने सुन रही थी। मुझे देखते ही वो मुस्कुराई,

“हो गई मालिश?”

“हाँ!” मैं झेंप गया था।

“चिन्नम्मा बहुत बढ़िया मालिश करती हैं। रोज़ करवाया करो। जब तुम खेतों पर काम शुरू करोगे, तो रोज़ अभ्यंगम करवाना। थकावट तो यूँ चुटकी बजाते निकल जाएगी।“

“तुम करवाती हो?”

“हाँ!”

“क्या सच?”

“हाँ! इसमें झूठ वाली क्या बात है?”

“रोज़?”

“हाँ, लगभग रोज़ ही। मतलब, हफ्ते में तीन चार बार तो हो ही जाता है। नहीं तो मेरा थक कर चूरा बन जाएगा।“

“हा हा!”

“तो, आज का क्या प्लान है?”

“नहाना है…”

“तो नहा लो..”

“तालाब पर…”

अल्का की मुस्कराहट और बढ़ गई।

“मालूम था… चिन्नू जी को तालाब पर ही नहाना रहेगा। तो जाओ, नहा लो न!”

“तुम भी चलो।“

“क्यों?”

“तुमने नहा लिया?”

“हाँ!”

“ओह!” मेरा मुँह लटक गया।

“लेकिन चल सकती हूँ। आज कोई काम नहीं है, और ये रेडियो पर भी बहुत ही पुराने गाने आ रहे हैं।“

मैं तुरंत खुश हो गया। “तो चलो..”

“ठीक है, लेकिन कुछ खाने को रख लेते हैं।“