मंगलसूत्र (एक लघु-कथा) 11

“उई माँ! चिन्नू, तुम antarvasna बहुत खराब हो! देखो kamukta तुम्हारी बातों में आने का अंजाम! मेरी ऐसी हालत है की यह सब पहनने या न पहनने का कोई मतलब नहीं रह गया! हट्ट!”

कह कर वो अपने गोल गोल नितम्ब मटकाती हुई अपने कपड़ो की तरफ चल दी। हमने चुप रह कर जैसे तैसे अपने कपडे बदले (अल्का और मैंने अपने अधोवस्त्र उतार दिए थे), और वापस अपने घर की तरफ चल दिए। आज पहली बार मैं खुद को अल्का के समीप असहज महसूस कर रहा था। जीवन से अबोधपन जब समाप्त हो जाता है, तो संभवतः ऐसे ही महसूस होता है। एक अजीब सा तनाव, एक अजीब सा खिंचाव! मन में एक विचार बार बार आता – क्या अल्का ने यह सब जान बूझ कर किया या होने दिया था? अगर हाँ, तो उसकी मंशा क्या थी? अगर न, तो अगर मैंने पहल की, तो क्या होगा! यही सोच सोच कर मैंने रात का खाना खाया।

उस रात को जब हम सोने के लिए बिस्तर पर आये, तो अल्का ने कहा,

“चिन्नू, तुमने मुझे आज ऐसे देख ही लिया है। तो…

“अल्का, मैंने प्रॉमिस किया है न कि मैं किसी से कुछ नहीं कहूँगा!” मैंने कहा।

“नहीं… वो बात नहीं… सोते समय अगर मैं भी कपडे उतार कर लेटूँ तो?”

“तुम्हारा घर है, अल्का! जैसा तुमको अच्छा लगे?”

“ओये होए! कैसा भोला बन रहा है मेरा चिन्नू!!” अल्का ने मुझे चिढ़ाते हुए कहा, “इतनी अच्छी किस्मत नहीं है तुम्हारी! हा हा हा! लेकिन एक बात याद रखना! जो भी कुछ हुआ, वो किसी को न बताना!”

ये तो मुझे आज की घटनाएं भूलने ही नहीं दे रही है! वैसे भी ऐसा दिव्य दर्शन कोई भूल भी कैसे सकता है?

अल्का की बात से मैं हकलाने लगा, “नननननहीं! मैं कुछ नहीं कहूँगा!”

“गुड नाईट चिन्नू!”

निरंतर उत्तेजित रहना मेरे लिए मानिए जैसे आम बात थी। उस समय भी कुछ अलग नहीं था। उत्तेजना के कारण मुझे नींद नहीं आ पा रही थी। मेरा लिंग उत्तेजना से स्पंदन कर रहा था। दिमाग में अल्का का नग्न शरीर घूम रहा था! ऊपर से उसकी अभी अभी की गई छेड़खानी से मेरा सोना और भी कठिन हो गया था। ऐसे ही सोने की कोशिश करते करते एक घंटे से ऊपर हो गया। मैं अभी भी नहीं सो पा रहा था। अल्का की साँसे गहरी गहरी चल रहीं थीं, इसका मतलब वो सो चुकी थी। सोते सोते ही अचानक ही उसने करवट बदली, और उसने अपना हाथ मेरे सीने पर रख दिया। न जाने क्यों, अल्का की छुवन से मुझे राहत सी मिली। सतत् स्तम्भन के दर्द को अपने लिंग में महसूस करने के बाद भी मैं सोने में सफल हो गया।

अगले दिन जब मैं उठा तो मेरे शॉर्ट्स के सामने गीला, चिपचिपा धब्बा बना हुआ था। मुझे स्वप्न-दोष हो गया था। शॉर्ट्स के साथ साथ ओढ़ने वाली चद्दर और बिस्तर का बिछौना, दोनों भी गीले हो गए थे!

‘बाप रे! कितना सारा वीर्य गिरा है!’

मुझे मालूम था, कि अल्का जब यह सब गन्दगी देखेगी तो समझ जायेगी कि यह सब उसकी पारदर्शक चड्ढी से होने वाले अंग-प्रदर्शन के का प्रभाव है। उसी के कारण मुझे ‘वो’ सपना भी आया था। सपने में मैंने देखा कि अल्का और मैं, हम दोनों पूर्ण नग्न हो कर नीले समुद्र में तैर रहे हैं। तैरने के बाद हम समुद्र-तट पर एक चद्दर के ऊपर साथ साथ लेट गए हैं। मेरा एक हाथ उसके एक स्तन पर था और दूसरा उसकी जाँघों के बीच की गहराई में उतर रहा था। मेरी उंगलियां उसकी योनि की गहराई माप रही थीं। अल्का भी मेरे तने हुए लिंग को अपनी मुट्ठी में भरे ऊपर नीचे कर रही थी। कुछ देर के बाद मेरे अंदर का लावा तीव्र वेग से हवा में उछल जाता है, और अल्का के हाथ पर गिर जाता है। यही काम सोते समय मेरे लिंग ने भी कर दिया होगा। यह सब गन्दगी उसी की निशानी है।

मैं जल्दी से गुसलखाने में गया, और वहां जा कर खुद की और शॉर्ट्स की सफाई करी। वहां एक कपडे को गीला कर के मैं शयनकक्ष में वापस आया, जिससे की चद्दर साफ़ कर सकूँ, लेकिन तब तक बहुत देर हो गई थी। अल्का बिस्तर पर से चद्दर बदल चुकी थी, और निश्चित तौर पर वो मेरे कारनामे देख चुकी थी। मुझे कमरे में आते देख कर उसने मुस्कुराते हुआ कहा,

“नॉटी नॉटी! कल किसके सपने देख रहा था मेरा चिन्नू?”

मैं शर्म के मारे ज़मीन में गड़ा जा रहा था। कुछ कहते नहीं बना। और वो कहते जा रही थी,

“ज़रूर बहुत ही सुन्दर रही होगी वो! कौन थी वो चिन्नू?”

अल्का की बात से मुझे एक बात तो समझ आई और वो यह कि उसको स्त्री-पुरुष के शारीरिक भेद, अंतर और प्रक्रियाओं के बारे में मालूम था। और एक बात, अल्का के सामने मैं यह नहीं मान या कह सकता था कि मैं उसके ही सपने देख रहा था। यह बात सुन कर वो शर्मसार हो सकती थी, या नाराज़! इस दशा में कुछ न कहना ही श्रेयस्कर था। अल्का मेरे मन में चल रही इन सब बातों से बेखबर मेरी टाँगे खींचने में लगी हुई थी।

“क्या हुआ? कुछ बोलते क्यों नहीं?”

उसकी चिढ़ावन भरी ज़िद से तंग आ कर मैं आखिरकार बोल ही पड़ा, “अगर जानना ही चाहती हो तो सुनो! मैं तुम्हारे सपने देख रहा था! अब खुश?”

और जैसा की मैंने सोचा था, वो शर्म से लाल हो गई। अल्का के गालों में सुर्ख रंग उत्तर आया था। मैं खुद भी शर्मसार था। मैं मुड़ा, और कमरे से बाहर निकलने लगा। बाहर निकलते निकलते मुझे भ्रम हुआ की अल्का बुदबुदा रही है : “और मैं तुम्हारे…”